महाराष्ट्र में दीपावली अलग तरीके से मनायी जाती है। राज्य में यह उत्सव पांच दिन तक चलता है। इस दौरान धार्मिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक परम्पराओं से संबंधित कार्यक्रमों का आयोजन होता है। इस समय जब आप समाचार बुलेटिन सुन रहे हैं, तब महाराष्ट्र के लोग संगीत कार्यक्रम का आनन्द ले रहे हैं, जिसे दिवाली पहट कहा जाता है। आज प्रात: काल के मुहूर्त को नरकासुर पर भगवान श्रीकृष्ण की विजय से जोड़कर देखा जाता है। विजय उत्सव के प्रतीक के रूप में सभी घरों में तेल के दिए जलाए जाते हैं और द्वार पर रंगोलिया सजायी जाती हैं। इस अवसर पवित्र स्नान को अभ्यंग स्नान कहा जाता है। दीपावली के अवसर पर राज्य में पत्रिकाओं के विशेष दीपावली अंकों के प्रकाशन की भी परम्परा है। इसका उद्देश्य पाठकों को उत्सव का साहित्यिक पक्ष प्रदान करना है। संस्कृत के विद्वान रचनाकार धनश्री लेले ने इस परम्परा के बारे में आकाशवाणी के श्रोताओं के लिए विशेष जानकारी दी।
महाराष्ट्र में दीपावली उत्सव का एक प्रमुख आकर्षण उन ऐतिहासिक किलों की अनुकृतियां हैं, जिनका निर्माण बच्चे करते हैं। यह परम्परा मराठा योद्धा छत्रपति शिवाजी महाराज की विरासत से जुड़ी हुई है। दीपोत्सव के अवसर पर महाराष्ट्र में पवित्र नदियों के घाटों पर तीर्थ यात्रा की भी परम्परा है। सोलापुर जिले के पंढरपुर में चन्द्रभागा नदी के घाट पर इस अवसर पर एक हजार एक दिए जलाए जाते हैं। महाराष्ट्र सरकार और सामाजिक तथा राजनीतिक क्षेत्र की हस्तियां इन क्षेत्रों में दीपावली के अवसर पर विभिन्न प्रकार के कार्यक्रमों का आयोजन करती हैं, जो मराठी संस्कृति की समृद्धि पर केन्द्रित होते हैं।
महाराष्ट्र की नई सरकार ने दीपावली के अवसर पर कईं नए कार्यक्रमों की घोषणा की है। सरकार की ओर से विशेष दीपावली अनाज किट प्रदान करने की शुरुआत की गई है, जिसे आनन्द शीधा नाम दिया गया है। राशन की दुकानों पर कार्ड धारकों को इसके माध्यम से अनाज उपलब्ध कराया जाएगा। सरकार ने कोरोना महामारी के दो साल के दौरान समर्पित होकर कार्य करने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों, परिवहन कर्मचारियों और शिक्षकों के सम्मान में उन्हें विशेष दिवाली बोनस देने की भी घोषणा की है।