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प्राकृतिक खेती द्वारा आत्मनिर्भर किसान, आत्मनिर्भर खेती से आत्मनिर्भर भारत का निर्माण करें – राज्यपाल आचार्य देवव्रत

गुजरात के राज्यपाल आचार्य देवव्रत ने भारत के नीति आयोग द्वारा नई दिल्ली के विज्ञान भवन में ‘इनोवेटिव एग्रीकल्चर’ विषय पर आयोजित राष्ट्रीय कार्यशाला को संबोधित करते हुए कहा कि जिस तरह जनशक्ति के सामर्थ्य से देश को अंग्रेजों की गुलामी से मुक्त किया गया, उसी प्रकार प्राकृतिक खेती के जन आंदोलन द्वारा देश को रासायनिक खेती से मुक्ति दिलाएँ।

राज्यपाल ने कहा कि देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने किसानों की आय को दोगुनी करने का प्रण लिया है। यह तभी संभव हो पाएगा, जब देश के किसान रासायनिक खेती को त्यागकर प्राकृतिक खेती को पूरे मनोभाव से अपनाए। राज्यपाल ने प्रधानमंत्री के ‘जब ज़मीन जवाब दे देगी तो क्या करोगे’ वाक्य का उल्लेख करते हुए कहा कि रासायनिक खेती के कारण ज़मीन बंजर होती जा रही है, भूजल और नीचे जा रहा है। कृषि खर्च में दिन-प्रतिदिन वृद्धि हो रही है। रासायनिक खाद एवं जंतुनाशकों से दूषित खाद्यान्न खाने से लोग केंसर, डायाबिटीस, ह्रदय रोग जैसे असाध्य बीमारी का शिकार बन रहे हैं। ऐसे में रासायनिक खेती के इन दुष्परिणामों से मुक्ति पाने के लिए प्राकृतिक खेती ही अपनाना होगा, जो समय की माँग है।

राज्यपाल ने कहा कि आज़ादी के बाद देश की खाद्यान्न आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए रासायनिक कृषि को अपनाना समय की मांग थी। देश के कृषि वैज्ञानिकों ने इस दिशा में सहारनीय कार्य किया है, किन्तु आज समग्र विश्व रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से परेशान है। विशेषज्ञों के अनुसार ग्लोबल वॉर्मिंग की समस्या में रासायनिक खेती का 24 प्रतिशत हिस्सा है। ऐसे में रासायनिक खेती को त्यागकर किसान प्राकृतिक खेती अपनाएँ। उन्होंने यह भी कहा कि प्राकृतिक खेती के द्वारा ही आत्मनिर्भर किसान, आत्मनिर्भर खेती से आत्मनिर्भर भारत का निर्माण हो पाएगा।

भारत के नीति आयोग द्वारा आयोजित इस राष्ट्रीय स्तर के कार्यशाला को संबोधित करते हुए राज्यपाल ने कहा कि रासायनिक खेती के कारण आज भारत देश रासायनिक खाद का 1 लाख 60 हजार करोड़ रुपए की सब्सिडी का आर्थिक बोझ उठा रहा है। रासायनिक उर्वरकों के आयात के पीछे करोड़ो रुपए की विदेशी मुद्रा खर्च हो रही है। प्राकृतिक खेती में गाय का गोबर, गोमूत्र, बेसन, गुड़ और मिट्टी द्वारा बनाए जाने वाले जीवामृत-धनजीवामृत का प्रयोग करके रासायनिक खादों के पीछे होने वाले खर्च को बचाया जा सकता है।

इस अवसर पर राज्यपाल ने जैविक कृषि एवं प्राकृतिक खेती के बीच के अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि जैविक खेती में खाद्यान्न को 7 किलो नाइट्रोजन की पूर्ति के लिए 300 क्विंटल जितनी बड़ी मात्रा में खाद की आवश्यकता होती है अथवा इसके विकल्प के रूप में 150 क्विंटल वर्मी कम्पोस्ट (कृमि खाद) की आवश्यकता है, जो सामान्य किसानों के लिए संभव नहीं हो पाता है। जैविक खेती में आच्छादन (मलचिंग) की व्यवस्था नहीं है। इस कारण निराई की समस्या उत्पन्न होती है। इतना ही नहीं जैविक खेती में पहले तीन सालों तक उत्पादन में कमी आती है। इसके सामने प्राकृतिक खेती में जीवामृत तथा धनजीवामृत के उपयोग से उत्पादन कम नहीं होती है। इतना ही नहीं रासायनिक खेती की तुलना में प्राकृतिक खेती द्वारा प्राप्त होने वाले उत्पादन की गुणवत्ता भी अच्छी होती है। यह बात राज्यपाल ने कुरुक्षेत्र के गुरुकुल में हो रही प्राकृतिक खेती के आत्म-अनुभव का वर्णन करते हुए कही। उन्होंने कच्छ के आशापुरा फॉर्म में 400 एकड़ जमीन में रासायनिक खेती के बदले प्राकृतिक खेती अपनाने से पहले ही साल कृषि उत्पादन में 15 प्रतिशत के लाभ मिलने तथा लगभग 1 करोड़ रुपए के जंतुनाशक दवाईयों के पीछे किए जाने वाले खर्च में आई कमी का उदाहरण देते हुए समझाया।

राज्यपाल ने प्राकृतिक खेती में जमीन के आच्छादन-मल्चिंग के महत्त्व को दोहराते हुए कहा कि आच्छादन से ज़मीन को ऊँचे तापमान से सुरक्षा मिलती है। नमी का प्रमाण बना रहता है। प्राकृतिक खेती से पानी की खपत को 50 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। ज़मीन के ऑर्गेनिक कार्बन का निर्वाह होता है तथा निराई की समस्या से बचा जा सकता है। उन्होंने कहा कि रासायनिक खेती के कारण मित्र जीवों के समान कीड़ों का नाश होता है, जो खेती के प्राण समान है, जबकि प्राकृतिक खेती में मल्चिंग के कारण ऐसे मित्र समान सूक्ष्म जीवों की वृद्धि होती है। यह ज़मीन के ऑर्गेनिक कार्बन को बढ़ाते है और जमीन को उपजाऊ बनाते है। उन्होंने रासायनिक खेती के दुष्परिणामों से मुक्ति पाने के लिए निराशा को त्यागकर पूरे उत्साह से प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए देशभर के किसानों का आह्वान किया। उन्होंने पारिवारिक चिकित्सक की तरह पारिवारिक किसान की आवश्यकता पर भार दिया।

राज्यपाल ने हिमाचल प्रदेश में प्राकृतिक खेती के साथ 2 लाख किसानों के जुड़ने तथा उसी प्रकार से गुजरात में भी दो लाख किसानों के प्राकृतिक खेती के साथ जुड़ने की बात कही।

इस अवसर पर केंद्रीय कृषि मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर, केंद्रीय पशुपालन मंत्री पुरुषोत्तम रूपाला, नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. राजीव कुमार ने भी अपने-अपने विचार रखें। इस कार्यशाला के तकनीकी सत्र में अपने विचारों को प्रस्तुत करने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान सहित विभिन्न राज्यों के मुख्यमंत्री तथा कृषि विशेषज्ञ भी उपस्थित थे।

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