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डॉ. जितेंद्र सिंह ने केरल के विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र के थंबा इक्वेटोरियल रॉकेट लॉन्च स्टेशन पर पहले साउंडिंग रॉकेट लॉन्च के 60वें वर्ष के उपलक्ष्य में आयोजित समारोह को संबोधित किया

केंद्रीय अंतरिक्ष राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि केरल के थुंबा से भारत के पहले साउंडिंग रॉकेट प्रक्षेपण की हीरक जयंती ऐसे समय में हो रही है जब 2023 में चंद्रयान-3 और आदित्य-एल1 मिशन की ऐतिहासिक जुड़वां उपलब्धियां देखी गईं।

उन्होंने कहा, वर्ष 2023 इतिहास में उस वर्ष के रूप में भी दर्ज किया जाएगा, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 23 अगस्त, जिस दिन चंद्रयान-3 चंद्रमा पर उतरा था, को ‘राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस’ के रूप में घोषित किया था।

केंद्रीय विज्ञान और प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), पीएमओ, कार्मिक, लोक शिकायत, पेंशन और परमाणु ऊर्जा राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह, विक्रम साराभाई अंतरिक्ष केंद्र, थुंबा इक्वेटोरियल रॉकेट प्रक्षेपण केन्द्र (टीईआरएलएस) में एक समारोह में पहले साउंडिंग रॉकेट प्रक्षेपण के 60 वें वर्ष के स्मरणोत्सव को संबोधित कर रहे थे।

इस अवसर पर, डॉ. जितेंद्र सिंह ने स्पेस पॉड से एक समान साउंडिंग रॉकेट के रस्मी प्रक्षेपण को देखा, जहां प्रारंभिक प्रक्षेपण 21 नवंबर, 1963 को हुआ था। एक प्रतीकात्मक रूप में, प्रमोद पी. काले द्वारा उलटी गिनती की घोषणा की जा रही थी, जिन्होंने 60 साल पहले प्रक्षेपण पर उलटी गिनती पढ़ी थी।

बाद में मीडिया को संबोधित करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, चंद्रयान-3 और आदित्य-एल1 मिशन की सफलता भारत की स्वदेशी क्षमताओं को दोहराती है और उस सपने को सच करती है, जो इसरो के पहले अध्यक्ष और भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम के संस्थापक डॉ. विक्रम साराभाई ने छह दशक पहले देखा था।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “यह विक्रम साराभाई के सपने की पुष्टि भी है, जिनके पास संसाधनों की कमी हो सकती थी, लेकिन आत्मविश्वास की कमी नहीं थी, क्योंकि उन्हें खुद पर और भारत की अंतर्निहित क्षमता और अंतर्निहित कौशल पर भरोसा था।”

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, भारत आम आदमी के लिए ‘जीवन जीने में आसानी’ लाने के उद्देश्य से स्वामित्व, पीएम गति शक्ति, रेलवे, राजमार्ग और स्मार्ट शहर, कृषि, जल मानचित्रण, टेलीमेडिसिन और रोबोटिक सर्जरी जैसे विभिन्न क्षेत्रों में अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी का उपयोग करता है।

यह कहते हुए कि भारत की अंतरिक्ष उपलब्धियां ‘संपूर्ण विज्ञान और संपूर्ण राष्ट्र’ के दृष्टिकोण का प्रमाण हैं, डॉ. जितेंद्र सिंह ने अंतरिक्ष क्षेत्र के लिए नए रास्ते खोलकर इस सपने को वास्तविकता में बदलने के लिए मोदी को धन्यवाद दिया और उन्हें हमें यह बताने के लिए भी धन्यवाद दिया कि ‘आसमान कोई सीमा नहीं है’।

उन्होंने कहा, “भारत ने पिछले 9 वर्षों में रणनीतिक और नागरिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपनी स्वयं की क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली स्थापित की है। प्रधानमंत्री मोदी ने अंतरिक्ष क्षेत्र में सुधारों की शुरुआत की, जिससे भारतीय निजी खिलाड़ियों के लिए अंतरिक्ष आसानी से सुलभ हो गया और सभी हितधारकों को कवर करते हुए एक व्यापक भारतीय अंतरिक्ष नीति 2023 जारी की गई”।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि अंतरिक्ष सुधारों के लागू होने के बाद ही देश में स्टार्टअप में तेजी देखी गई और बहुत कम समय में 150 से अधिक अंतरिक्ष स्टार्टअप शुरू हो गए। पहला भारतीय निजी उप-कक्षीय प्रक्षेपण हाल ही में देखा गया था, जिसे अंतरिक्ष क्षेत्रीय सुधारों के माध्यम से सक्षम किया गया था।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पिछले 4 से 5 वर्षों में भारतीय अंतरिक्ष पहल की सफलता को बढ़ावा मिला है, जिसमें हालिया चंद्रयान-3 और आदित्य एल1 मिशन भी शामिल हैं और प्रधानमंत्री मोदी ने इसरो से भारत के पहले मानव अंतरिक्ष मिशन ‘गगनयान’ 2025 तक, चंद्र नमूना वापसी मिशन ‘भारतीय अंतरिक्ष केन्द्र’ 2035 तक और 2040 तक पहला भारतीय चंद्रमा पर कदम रख सके, इसका लक्ष्य रखने को कहा है।

यह कहते हुए कि भारत का अंतरिक्ष कार्यक्रम अब दुनिया की अग्रणी अंतरिक्ष एजेंसियों के बराबर आ गया है, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि नासा चंद्रमा पर उतरने वाला पहला देश हो सकता है, लेकिन यह भारत का चंद्रयान-1 था जिसने चंद्रमा पर पानी के अणुओं की खोज की और अब चंद्रयान-3 पहली बार चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरा है।

“भले ही संयुक्त राज्य अमेरिका और तत्कालीन सोवियत संघ ने हमसे बहुत पहले ही अपनी अंतरिक्ष यात्रा शुरू कर दी थी और अमेरिका ने भी 1969 में चंद्रमा की सतह पर एक इंसान को उतारा था, फिर भी यह हमारा चंद्रयान ही था, जिसने चंद्रमा की सतह पर पानी के सबूत को सिद्ध किया।” उन्होंने आगे कहा कि नासा ने इस साल प्रधानमंत्री मोदी की संयुक्त राज्य अमेरिका की ऐतिहासिक यात्रा के दौरान अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के लिए एक संयुक्त अंतरिक्ष मिशन की पेशकश की है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत के अंतरिक्ष मिशन मानव संसाधनों और कौशल पर आधारित लागत प्रभावी होने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं।

उन्होंने कहा, “रूसी चंद्रमा मिशन, जो असफल रहा था, उसकी लागत 16,000 करोड़ रुपये थी और हमारे (चंद्रयान -3) मिशन की लागत लगभग 600 करोड़ रुपये थी।”

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि आजादी के बाद से भारत की यात्रा में वैज्ञानिक परिवर्तन के लिए पिछले दस साल एक महत्वपूर्ण अवधि रही है और जहां तक अंतरिक्ष और भू-अंतरिक्ष और संपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्र का प्रश्न है, पिछले पांच वर्षों में, यह और भी अधिक दिखाई दे रहा है।

“वर्ष 2013 तक, प्रति वर्ष औसतन लगभग 3 प्रक्षेपण के साथ, 40 प्रक्षेपण वाहन मिशन पूरे किए गए। पिछले दशक में प्रति वर्ष औसतन 6 प्रक्षेपणों पर 53 प्रक्षेपण यान मिशनों के साथ, यह दोगुना हो गया है।” उन्होंने कहा, ”इसरो ने 2013 तक 35 विदेशी उपग्रह प्रक्षेपित किए थे। पिछले 9-10 वर्षों में इसमें तेजी से वृद्धि देखी गई है, जिसके दौरान इसरो ने 380 से अधिक विदेशी उपग्रह प्रक्षेपित किए, 220 मिलियन यूरो से अधिक की कमाई की और अमेरिकी उपग्रहों को भी प्रक्षेपित करके 170 मिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक की कमाई की।”

अमृतकाल और प्रधानमंत्री के “इंडिया@2047” के विजन का उल्लेख करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत की अर्थव्यवस्था में मूल्यवर्धन अब तक अज्ञात रहे क्षेत्रों से आने वाला, जिसमें अंतरिक्ष क्षेत्र भी शामिल है। उन्होंने कहा कि उस दृष्टिकोण से देखा जाए तो अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था देश की अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण योगदान देगी, जब स्वतंत्र भारत अपना 100वां स्वतंत्रता दिवस मनाएगा और दुनिया का अग्रणी राष्ट्र बनेगा।

उन्होंने कहा “अंतरिक्ष क्षेत्र के खुलने, अंतरिक्ष स्टार्टअप और औद्योगिक संयोजन के उद्भव के कारण, भारत की अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था आने वाले वर्षों में वर्तमान में लगभग 8 बिलियन डॉलर से बढ़कर 100 बिलियन डॉलर तक पहुंच सकती है, जैसा कि विदेशी व्यापार विशेषज्ञों द्वारा अनुमान लगाया गया है, जो भारत की लंबी छलांग से आश्चर्यचकित हैं।”

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