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संस्कृति मंत्रालय और भारतीय नौसेना ने “जहाज निर्माण की प्राचीन सिलाई वाली विधि (टंकाई विधि)” को पुनर्जीवित करने हेतु एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए

जहाज निर्माण की 2000 साल पुरानी तकनीक, जिसे ‘जहाज निर्माण की सिलाई वाली विधि’ के रूप में जाना जाता है, को पुनर्जीवित और उसे संरक्षित करने की दिशा में एक उल्लेखनीय पहल करते हुए, संस्कृति मंत्रालय और भारतीय नौसेना ने एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं।

इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर से संबंधित समारोह में संस्कृति मंत्रालय के सचिव गोविंद मोहन, संस्कृति मंत्रालय की संयुक्त सचिव उमा नंदूरी, संस्कृति मंत्रालय में निदेशक (एकेएएम) प्रियंका चंद्रा और भारतीय नौसेना की ओर से रियर एडमिरल के.एस. श्रीनिवास तथा कमोडोर सुजीत बख्शी एवं कमांडर संदीप रॉय सहित कई प्रतिष्ठित हस्तियां उपस्थित थीं।

भारतीय नौसेना इस संपूर्ण परियोजना के कार्यान्वयन एवं निष्पादन की निगरानी करेगी। समुद्री सुरक्षा के संरक्षक और इस क्षेत्र के विशेषज्ञ के रूप में, भारतीय नौसेना की भागीदारी निर्बाध परियोजना प्रबंधन और सुरक्षा एवं सटीकता के उच्चतम मानकों का पालन सुनिश्चित करेगी। उनका अमूल्य अनुभव एवं तकनीकी ज्ञान प्राचीन टंकाई विधि के सफल पुनरुद्धार और सिलाई वाले जहाज के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।

सिलाई वाले जहाज के ऐतिहासिक महत्व और पारंपरिक शिल्प कौशल के संरक्षण की दृष्टि से, इस जहाज का भारत में एक महत्वपूर्ण सांस्कृतिक मूल्य है। संपूर्ण इतिहास में, भारत की एक मजबूत समुद्री परंपरा रही है और सिलाई वाले जहाजों के उपयोग ने व्यापार, सांस्कृतिक आदान-प्रदान और अन्वेषण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। कीलों का उपयोग करने के बजाय लकड़ी के तख्तों की एक साथ सिलाई करके बनाए गए इन जहाजों ने लचीलापन और स्थायित्व प्रदान किया, जिससे उनमें उथले और रेत की पट्टियों से होने वाली क्षति की संभावना कम हुई। भले ही यूरोपीय जहाजों के आगमन से जहाज निर्माण की तकनीकों में बदलाव आया, लेकिन भारत के कुछ तटीय क्षेत्रों में, मुख्य रूप से छोटी स्थानीय मछली पकड़ने वाली नौकाओं के संदर्भ में, जहाजों की सिलाई की यह कला बची हुई है।

भावी पीढ़ियों के लिए इस सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण को सुनिश्चित करने हेतु इस लुप्त होती कला को पुनर्जीवित व सक्रिय करना महत्वपूर्ण है। सिलाई की इस प्राचीन भारतीय कला का उपयोग करके समुद्र में जाने वाले लकड़ी के सिले हुए पाल के जहाज के निर्माण का प्रस्ताव एक सराहनीय पहल है। इस परियोजना का लक्ष्य भारत में शेष बचे पारंपरिक जहाज निर्माताओं की विशेषज्ञता का लाभ उठाना और उनकी असाधारण शिल्प कौशल को प्रदर्शित करना है। पारंपरिक नौवहन तकनीकों का उपयोग करके प्राचीन समुद्री मार्गों पर नौकायन करके, यह परियोजना हिंद महासागर के साथ उस ऐतिहासिक जुड़ाव से संबंधित अंतर्दृष्टि हासिल करना चाहती है, जिसने भारतीय संस्कृति, ज्ञान प्रणालियों, परंपराओं, प्रौद्योगिकियों और विचारों के प्रवाह को सुविधाजनक बनाया है।

सिलाई वाले जहाज की इस परियोजना का महत्व इसके निर्माण से कहीं अधिक है। इसका उद्देश्य समुद्री स्मृति को पुनर्जीवित करना और अपने नागरिकों में भारत की समृद्ध समुद्री विरासत के बारे में गर्व की भावना पैदा करना है। इसके अतिरिक्त, इसका उद्देश्य हिंद महासागर के तटीय देशों के साथ सांस्कृतिक आदान-प्रदान से जुड़ी स्मृतियों को ताजा करना है। इस परियोजना के संपूर्ण दस्तावेजीकरण और सूचीबद्ध किए जाने से इस बहुमूल्य जानकारी का भविष्य के संदर्भ के लिए संरक्षित किया जाना सुनिश्चित हो सकेगा। यह परियोजना न केवल नाव-निर्माण के एक अद्वितीय प्रयास का प्रतिनिधित्व करेगी, बल्कि भारत की विविध सांस्कृतिक विरासत और प्राचीन समुद्री यात्रा परंपराओं का प्रमाण भी बनेगी।

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