आज सिक्खों के प्रथम गुरू गुरूनानक देवजी की पुण्यतिथि पर पूरा देश उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित कर रहा है। देश भर के गुरूद्वारों में विशेष प्रार्थना सभाओं का आयोजन किया जा रहा है। वातावरण में गूंजते गुरबाणी के शबद कीर्तन मन में भक्ति का संचार कर कर रहे हैं। उनके जीवन का हर प्रसंग पूरे विश्व को मानवता का अमर संदेश दे रहा है। गुरूनानक देवजी का जन्म रावी नदी किनारे तलवण्डी गाँव में कार्तिक पूर्णिमा को हुआ था। तलवण्डी का नाम आगे चलकर गुरू नानकदेवजी के नाम पर ननकाना साहब पड़ गया। बचपन से इनमें प्रखर बुद्धि के लक्षण दिखाई देने लगे थे। लड़कपन में भी ये सांसारिक विषयों से उदासीन रहा करते थे। पढ़ने-लिखने में इनका मन नहीं लगता था और ये अपना सारा समय आध्यात्मिक चिन्तन और सत्संग में व्यतीत करते थे। कुछ समय बाद इनका विवाह सुलक्खनी से हुआ, जिससे इनके दो पुत्र हुए श्रीचन्द और लखमीदास। 32 वर्ष की उम्र में अपने परिवार का भार अपने श्वसुर पर छोड़कर गुरूनानकदेव जी अपने शिष्य मरदाना, लहना, बाला और रामदास को लेकर तीर्थयात्रा के लिये निकल पडे़। 1521 तक इन्होंने चार यात्रा चक्र पूरे किए, जिनमें भारत, अफगानिस्तान, फारस और अरब के मुख्य स्थानों का भ्रमण किया। इन यात्राओं को पंजाबी में “उदासियाँ“ कहा जाता है। गुरूनानक देवजी सर्वेश्वरवादी थे। उन्होंने दुनिया को एक परमात्मा की उपासना का मार्ग दिखाया। गुरूनानक देवजी ने करतारपुर नामक एक नगर बसाया, जो अब पाकिस्तान में है। इन्होंने उसमें एक बड़ी धर्मशाला बनवाई। इसी स्थान पर संवत् 1597 में यानी 22 सितम्बर 1539 को इनका परलोक वास हो गया। देहत्याग से पहले उन्होंने अपने शिष्य भाई लहना को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया, जो बाद में गुरु अंगद देवजी के नाम से जाने गए। गुरुग्रन्थ साहिब गुरबाणी में इनके 974 शबद सम्मिलित किए गए हैं जो 19 रागों में निबद्ध हैं। इन शबदों को सुनकर आज भी मन अलौकिक आनंद से अभिभूत हो जाता है।
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