देश का 35वां संचार उपग्रह जीसैट-7ए सफलता पूर्वक अंतरिक्ष में प्रक्षेपित हो गया। इसे आन्ध्रप्रदेश में श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से कल शाम चार बजकर दस मिनट पर छोड़ा गया। यह इसरो की चौथी पीढ़ी का प्रक्षेपण यान है। इसरो का 35वां संचार उपग्रह जी-सैट 7ए, के-यू बैंड संचार सुविधा उपलब्ध कराएगा।
अंतरिक्ष जगत में भारत ने एक और इतिहास रच दिया। श्रीहरिकोटा से इसरो के वैज्ञानिकों ने कम्युनिकेशन सैटलाइट GSAT-7A का सफल प्रक्षेपण किया। इसमें 4 सोलर पैनल लगाए गए हैं, जिनके जरिए तकरीबन 3.3 किलोवॉट बिजली पैदा की जा सकती है। Gsat-7A से वायुसेना के एयरबेस इंटरलिंक होंगे साथ ही इसके जरिए ड्रोन ऑपरेशंस में भी मदद मिलेगी यानी इससे वायुसेना की नेटवर्किंग क्षमता मजबूत होगी.
जीसैट-7ए का वजन 2,250 किलोग्राम है। ये केयू-बैंड में संचार की सुविधा उपलब्ध करवाएगा। इसरो का यह 39वां संचार सैटलाइट है और इसे भारतीय वायुसेना को बेहतर संचार सेवा देने के खास इरादे के साथ ही लॉन्च किया गया है। इसरो के आधिकारिक बयान में कहा गया है कि जीएसएलवी-एफ11 की यह 13वीं उड़ान है और सातवीं बार यह इंडीजेनस क्रायोनिक इंजन के साथ लॉन्च किया गया है।
सैटेलाइट के सफल प्रक्षेपण के बाद इसरो के वैज्ञानिकों ने एक-दूसरे को बधाई दी। इस साल इसरो से छोड़े जाने वाला ये आखिरी उपग्रह था।
बुधवार को दोपहर बाद छोड़ा गया यह उपग्रह देश की तकनीकी उड़ान के लिए भी मील का पत्थर साबित हुआ। अपनी क्षमताओं और तकनीकी खूबियों की वजह से जीसैट 7ए बेहद ख़ास है
जिसमें चार सोलर प्लांट्स हैं जो 3.3 किलोवॉट तक की बिजली पैदा कर सकने में सक्षम हैं। यह इसरो का 35वां कम्यूनिकेशन सैटेलाइट है और
ख़ास बात यह भी रही कि अपनी कक्षा में छोड़े जाने के 100 सेकेंड में ही उपग्रह के सोलर पैनलों ने अपना काम शुरु कर दिया।
इस लॉंच में नज़रें तो जीएसएलवी रॉकेट पर भी थीं, और यह GSLV की लगातार छठी सफल उड़ान रही। बुधवार को GSLV MARK II रॉकेट ने करीब सवा दो हज़ार किलोग्राम के इस उपग्रह को जियोसिंक्रोनिस ट्रांस्फर ऑर्बिट में सफलता पूर्वक स्थापित कर दिया। बड़ी बात यह भी है कि इसरो अब ऐसे रॉकेटों पर तेज़ी से काम कर रहा है जो 4 टन से ज्यादा भारी उपग्रहों को भूस्थातिक कक्षा में स्थापित कर सके।
अपनी कक्षा में स्थापित होने के बाद अब संचार उपग्रह जी-सैट-7ए भारत की रक्षा तैयारियों और क्षमताओं के लिए काफी अहम साबित होगा, ख़ासकर वायु सेना के लिए।
अलग-अलग रडार स्टेशन, एयरबेस और अवॉक्स एयरक्राफ्ट को आपस में जोड़ा जा सकेगा। इसका मतलब ये है कि वायुसेना नेटवर्क आधारित युद्ध को अब ज्यादा बेहतरीन क्षमता के साथ अंजाम दे सकता है।
यह महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि सेनाओं के लिए अब दौर टैक्टिकल क्षमताओं का है, जिसे सहारा मिला है संचार उपग्रह जी-सैट-7ए का। साथ ही साथ दुनियाभर में ऑपरेशनों में भी सहायता मिल सकेगी।
इतना ही नहीं, जीसैट-7ए न सिर्फ सभी एयरबेसेज को आपस में जोड़ेगा बल्कि वायुसेना के ड्रोन ऑपरेशंस में भी इजाफा करेगा।
इसरो का यह सैटेलाइट ऐसे समय में लॉन्च हो रहा है जब भारत, अमेरिका से सी गार्डियन ड्रोन की खरीद प्रक्रिया को आगे बढ़ा रहा है, जो दुश्मन के लक्ष्य पर लंबी दूरी से आसानी से निशाना लगा सकता है। ख़ासबात यह भी है कि जीसैट-7ए को खासतौर पर इंडियन एयरफोर्स के लिए ही तैयार किया गया है। जिसका वज़न 2250 किलोग्राम का है।
इससे पहले सितंबर 2013 में इसरो ने जीसैट-7 लॉन्च किया था। जो भारतीय नौसेना के लिए बनाया गया था। भारत के पास इस समय करीब 13 मिलिट्री सैटेलाइट्स हैं जिनमें से ज्यादा सैटेलाइट रिमोट सेंसिंग सैटेलाइट्स हैं । रक्षा क्षमताओं में इन उपग्रहों की ज़रूरत का अंदाज़ा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि आतंकियों के खिलाफ हुई सर्जिकल स्ट्राइक में सेना की बड़ी मदद की थी। इसरो का इस वर्ष का यह आखिरी मिशन है। और अब नज़रें अगले वर्ष यानी 2019 में इसरो चंद्रयान-2 और पीएसएलवी-सी44 को लॉन्च करेगा। इसके अलावा इसरो के सात और मिशन पर भी सबकी नजरें रहेंगी।
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