केन्द्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री भूपेन्द्र यादव ने आज शर्म-अल-शेख में आयोजित विश्व के नेताओं के शिखर सम्मेलन, कॉप 27 में सभी विशेष कार्य योजना से संबंधित पूर्व चेतावनियों के लिए संयुक्त राष्ट्र महासचिव के उच्च-स्तरीय सम्मेलन को संबोधित किया।
कार्यक्रम में बोलते हुए यादव ने कहा: “हम सभी के लिए पूर्व चेतावनियां हासिल करने के महासचिव के एजेंडे का पूरी तरह से समर्थन करते हैं। जलवायु परिवर्तन की दर को नियंत्रित करने के लिए ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने की वैश्विक गति पर्याप्त नहीं है। दुनिया को व्यापक नुकसान पहुंचाने वाले प्राकृतिक खतरों को स्वीकार करने की दुनिया को तत्काल आवश्यकता है।
लेकिन ये मुद्दे एक पल के लिए हमारे दिमाग पर जोर डालते हैं और फिर जल्द ही ध्यान हटा देते हैं क्योंकि इसके बारे में कुछ करने में सक्षम देश सबसे कम प्रभावित हैं। वे जलवायु परिवर्तन में सबसे बड़े योगदानकर्ता भी हैं।
अधिकांश सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र कर्क और मकर कटिबंध के बीच स्थित हैं। भारत सहित अधिकांश विकासशील दुनिया इन कटिबंधों के बीच है। बाहरी आपदाओं की शुरुआत के बाद मुकाबला करने की कम से कम क्षमता के साथ सार्वजनिक व्यय और राजस्व की हानि इस क्षेत्र में पहले ही बढ़ने लगी है।
प्रशांत और कैरिबियन में उष्णकटिबंधीय चक्रवातों की तीव्रता का मतलब है कि कुछ छोटे उष्णकटिबंधीय देशों ने कुछ ही घंटों में अपनी राष्ट्रीय आय का 200 प्रतिशत खो दिया है। इस तरह के उदाहरणों के उन देशों में विनाशकारी परिणाम हो सकते हैं जिनके पास उनसे निपटने के पर्याप्त साधन नहीं हैं।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किसी भी प्रकार की वित्तीय सहायता अभी भी दुर्लभ है, पूर्व चेतावनी के विस्तार के रूप में जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभाव कम करने के लिए किए जाने वाले कार्य जीवन और आजीविका की सुरक्षा में महत्वपूर्ण है। सभी के लिए पूर्व चेतावनी न केवल तत्काल भौतिक प्रभावों को नियंत्रित करने में बल्कि दूरगामी दीर्घकालिक सामाजिक-आर्थिक अनुमानों को कम करने में भी एक भूमिका निभाती है।
भारत सभी जल-मौसम संबंधी खतरों के लिए शुरू से अंत तक पूर्व चेतावनी प्रणाली को मजबूत करने पर काम कर रहा है। इसके ठोस परिणाम सामने आए हैं: हमने पिछले 15 वर्षों में चक्रवाती तूफानों से होने वाली मृत्यु दर को 90 प्रतिशत तक कम किया है। पूर्व और पश्चिम दोनों तटों पर, हमारे पास चक्रवाती तूफानों के लिए पूर्व चेतावनी प्रणालियों का लगभग 100 प्रतिशत कवरेज है। इसी तरह अन्य खतरों- जैसे कि लू के लिए हम तेजी से प्रगति कर रहे हैं, जिससे हमारे समाज में बहुत अधिक लचीलापन आ रहा है।
पिछले कुछ वर्षों में, हमने पूर्व चेतावनी प्रणालियों को समाज द्वारा अधिक आसानी से समझने योग्य और कार्य करने योग्य बनाने की दिशा में ठोस प्रयास किए। हमारे पास वेब-डीसीआरए (डायनेमिक कम्पोसिट रिस्क एटलस) विकसित करने के लिए एकीकृत जोखिम, संवेदनशीलता और विस्तृत जानकारी है ताकि पूर्व चेतावनियों पर तेजी से और आगे बढ़कर कार्य किया जा सके।
आईएमडी, नई दिल्ली में चक्रवात चेतावनी प्रभाग (सीडब्ल्यूडी) बंगाल की खाड़ी और अरब सागर क्षेत्र में 13 देशों के साथ हिन्द महासागर के उत्तर में (विश्व के छह केन्द्रों में से एक) बनने वाले उष्णकटिबंधीय चक्रवातों पर निगरानी, भविष्यवाणी और चेतावनी सेवाएं जारी करने के लिए एक बहुपक्षीय क्षेत्रीय विशिष्ट मौसम विज्ञान केन्द्र के रूप में भी कार्य करता है। इस सहयोग ने बंगाल की खाड़ी (बीओबी) और अरब सागर के देशों से आईएमडी को मौसम संबंधी आंकड़ों के आदान-प्रदान और बेहतर निगरानी व पूर्वानुमान में मदद की।
इसके अलावा, उपग्रह और रडार के मौसम संबंधी डेटा, और उष्णकटिबंधीय चक्रवात परामर्श बुलेटिन के साथ आईएमडी के मॉडल मार्गदर्शन ने जीवन के नुकसान को कम करने में देशों की मदद की। उदाहरण के रूप में, इनमें जान गंवाने वालों की संख्या कम हुई है, पिछले 10 वर्षों के दौरान उष्णकटिबंधीय चक्रवात के कारण केवल 100 लोगों की जान गई, ऐसा, न केवल भारत में संभव हुआ बल्कि बंगाल की खाड़ी और अरब सागर क्षेत्र के सभी देशों को इसका लाभ मिला जिसके लिए आईएमडी चक्रवाती तूफान का पूर्वानुमान और सलाह प्रदान करता है।
अब हम न केवल जीवन के नुकसान को कम करने के लिए बल्कि आजीविका और राष्ट्रीय विकास के लाभ के लिए पूर्व चेतावनी प्रणालियों की पूरी क्षमता को अधिकतम करना चाहते हैं। भारत ने आपदा रोधी आधारभूत सुविधाओं (सीडीआरआई) के लिए गठबंधन की अगुवाई की, जो बुनियादी ढांचे के नुकसान और बुनियादी सेवाओं में व्यवधान को कम करने के लिए जलवायु पूर्वानुमान और पूर्व चेतावनी के एप्लीकेशन विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है।
भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ग्लासगो में कॉप 26 में आईआरआईएस (इन्फ्रास्ट्रक्चर फॉर रेजिलिएंट आइलैंड स्टेट्स) की शुरुआत में मानव कल्याण के लिए आईआरआईएस के महत्व पर प्रकाश डाला। प्रधानमंत्री ने कहा, और मैं उधृत करता हूं
“आईआरआईएस सबसे कमजोर देशों को आशा, विश्वास और पूर्ति की एक महान भावना प्रदान करता है। मैं इसके लिए सीडीआरआई को बधाई देता हूं। आईआरआईएस और सीडीआरआई सिर्फ बुनियादी ढांचे के बारे में नहीं बल्कि मानव कल्याण की जिम्मेदारी से जुड़ा है। मानव जाति के प्रति यह हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। मैं आईआरआईएस के शुभारंभ को बहुत महत्वपूर्ण मानता हूं। आईआरआईएस के माध्यम से एसआईडीएस के लिए प्रौद्योगिकी, वित्त और आवश्यक जानकारी तेजी से जुटाना आसान होगा। छोटे द्वीप वाले देशों में गुणवत्तापूर्ण बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देने से वहां के जीवन और आजीविका दोनों को लाभ होगा।”
भारत ने सीडीआरआई बनाया और उसे विकसित कर रहा है। यह बुनियादी ढांचे में नवाचार और लचीलेपन को बढ़ावा देने के लिए विभिन्न हितधारक संस्थानों और व्यक्तियों को शामिल करने के लिए ठोस प्रयास कर रहा है। ऐसी ही एक पहल “डीआरआई कनेक्ट” है जो बुनियादी ढांचा क्षेत्रों से जुड़े हितधारकों के लिए एक वेब-आधारित मंच होगा। मंच की परिकल्पना नई जानकारी और कार्रवाई योग्य समाधानों के लिए गठबंधन की सदस्यता की सामूहिक बुद्धिमत्ता का दोहन करने के लिए की गई है ताकि लचीले बुनियादी ढांचे में चुनौतियों का समाधान किया जा सके और आपदा-रोधी आधारभूत सुविधाओं पर कार्य आधारित अध्ययन और नवाचार का माहौल बढ़ाया जा सके।
वर्तमान में 31 देशों और आठ सदस्य संगठनों को शामिल करने के लिए सीडीआरआई की सदस्यता बढ़कर 31 हो गई है। अफ्रीकी क्षेत्र में बढ़ते पदचिह्न हैं। दक्षिण सूडान और यूरोपियन इनवेस्टमेंट बैंक चार्टर का समर्थन करने वाले नवीनतम सदस्य हैं। सीडीआरआई की रणनीतिक पहल, विस्तार कार्यक्रम, और सदस्यों को जोड़ना उसे अपने लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में आगे बढ़ा रहा है।
जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए किसी भी प्रकार की वित्तीय सहायता अभी भी एक मृगतृष्णा है, और सभी के लिए जलवायु परिवर्तन के नकारात्मक प्रभाव कम करने के रूप में पूर्व चेतावनी प्राकृतिक खतरों के प्रति असुरक्षा कम करने, तैयारी सुनिश्चित करने और तेजी से और समय पर प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने में हमारी सामूहिक रूप से मदद करता है।
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