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केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने FMC, पुणे के एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडिया (API) खंड का शुभारंभ किया

केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सशस्त्र बल चिकित्सा महाविद्यालय (एएफएमसी), पुणे के पूरे वर्ष चलने वाले प्लैटिनम जयंती समारोह के हिस्से के रूप में, आज एएफएमसी, पुणे के एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडिया (एपीआई) खंड का शुभारंभ किया। डॉ. सिंह ने इस अवसर पर एपीआई-एएफएमएस सतत चिकित्सा शिक्षा (सीएमई) के “चिकित्सा के व्यवसाय में उभरते रुझान” पर पहले वार्षिक सम्मेलन का भी उद्घाटन किया।

सशस्त्र बल चिकित्सा महाविद्यालय, पुणे को नई दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान-एम्स के अस्तित्व में आने से बहुत पहले स्थापित पहला केंद्रीय सरकारी चिकित्सा शिक्षा संस्थान बताते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि एक अलग सशस्त्र बल चिकित्सा महाविद्यालय का विचार किसी और से नहीं बल्कि डॉ. बीसी रॉय की सोच से आया था, जिन्हें एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडिया (एपीआई) को विकसित करने का श्रेय भी दिया जाता है।

उन्होंने कहा, “एक साझा विरासत के रूप में, एसोसिएशन ऑफ फिजिशियन ऑफ इंडिया (एपीआई) और सशस्त्र बल चिकित्सा महाविद्यालय (एएफएमसी) का एक साथ आना भी एक ऐतिहासिक मूल्य है और पहली पीढ़ी के चिकित्सक डॉ. बीसी रॉय को एक सच्ची श्रद्धांजलि है।”

डॉ. जितेंद्र सिंह ने सम्मेलन में अपने उद्घाटन भाषण में कहा कि एक दायरे में काम करने का युग समाप्त हो गया है और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नौ वर्षों के शासन के दौरान, मंत्रालयों और विभागों सहित सरकार के विभिन्न अंगों, विभिन्न संघों, उच्च और विशिष्ट शिक्षण संस्थानों और उद्योग के साथ, विशेष रूप से स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र को एकीकृत करने के लिए उचित प्रयास किए गए हैं।

स्वयं एक प्रतिष्ठित मधुमेह रोग विशेषज्ञ और चिकित्सा के प्रोफेसर डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि निदान और चिकित्सीय औषधि के नए उपकरणों के लिए वांछित अधिकतम परिणामों के लिए समग्र और “संपूर्ण विज्ञान” दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है।

देश में पहली बार ‘प्रिवेंटिव हेल्थकेयर’ को फोकस में लाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को धन्यवाद देते हुए डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि ऐसे देश में जहां 70 प्रतिशत आबादी 40 वर्ष से कम उम्र की है और आज के युवा इंडिया@2047 के प्रमुख नागरिक बनने जा रहे हैं।

उन्होंने कहा, “निवारक स्वास्थ्य देखभाल और व्यापक रूप से लोगों की जांच से भारत को एक विकसित अर्थव्यवस्था का दर्जा हासिल करने में मदद मिलेगी। पूरी दुनिया ने कोविड -19 के दौरान भारत की नेतृत्वकारी भूमिका को पहचाना, क्योंकि इसने पूरी तरह से डिजिटल प्लेटफॉर्म – कोविन के माध्यम से 220 करोड़ से अधिक टीकाकरण करने की दुर्लभ उपलब्धि हासिल की और यह प्रक्रिया जारी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में, केवल दो वर्षों की अवधि में, भारत दो डीएनए वैक्सीन और एक नेज़ल वैक्सीन का उत्पादन कर सकता है।”

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि पिछली आधी सदी में संपूर्ण रोग क्षेत्र के साथ-साथ हमारे लिए उपलब्ध चिकित्सीय और निवारक तौर-तरीकों के विकास में भी बदलाव आया है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “अस्सी के दशक के बाद, वैश्वीकरण या बीमारियों का तथाकथित ‘लोकतंत्रीकरण’ हुआ, इसलिए हमें जीवनशैली संबंधी बीमारियाँ, कोरोनरी बीमारियाँ आदि भी होने लगीं और इसके साथ ही जीवन प्रत्याशा में भी बदलाव आया है और जीवन प्रत्याशा 70 वर्ष के करीब हो गई है।”

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि इसी उद्देश्य के साथ, विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) ने आज रक्षा मंत्रालय के सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा (एएफएमएस) के साथ एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए। समझौता ज्ञापन में बायोमेडिकल विज्ञान में अनुसंधान सहयोग बनाने और संकाय विनिमय कार्यक्रमों के माध्यम से वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देने की परिकल्पना की गई है।

पुणे में सशस्त्र बल चिकित्सा महाविद्यालय में एक संक्षिप्त समारोह के दौरान डॉ. जितेंद्र सिंह की उपस्थिति में जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के सचिव डॉ. राजेश एस गोखले और सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा (एएफएमएस) के महानिदेशक लेफ्टिनेंट जनरल दलजीत सिंह द्वारा समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए गए।

उन्होंने कहा, “समझौता ज्ञापन जीनोमिक्स जैसे क्षेत्रों में नए शोध को आगे बढ़ाने में मदद करेगा, जिसका जीवन शैली से जुड़ी बीमारियों और घातक कैंसर जैसी उभरती बीमारियों पर असर पड़ता है।”

सहयोगात्मक अनुसंधान और प्रशिक्षण के लिए अंतर-मंत्रालयी सहयोग पर इस समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर करने के लिए जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा (एएफएमएस) को एक साथ आने के लिए बधाई देते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि सैन्य कर्मियों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और प्रदर्शन को सुनिश्चित करने के लिए बायोटेक अनुप्रयोग विविध और महत्वपूर्ण हैं।

उन्होंने कहा, “जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) ने बायोमेडिकल क्षेत्र में विशेष रूप से उन्नत निदान, चिकित्सीय और टीकों के विकास में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और हमारी स्वास्थ्य प्रणालियों का समर्थन करने के लिए अत्याधुनिक अनुसंधान में लगे हुए हैं।”

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, यह समझौता ज्ञापन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा योजनाओं और विचारों के एकीकरण, मंत्रालयों और विभागों के बीच मतभेदों को समाप्त करने के माध्यम से निर्धारित “संपूर्ण सरकार” के दृष्टिकोण की दिशा में एक और कदम है।

उन्होंने कहा, “जैव प्रौद्योगिकी अमृत काल की अर्थव्यवस्था और भारत को दुनिया में अग्रणी राष्ट्र बनाने की कुंजी होगी। पिछले 9 वर्षों में जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में तेजी से विकास हुआ है और भारत को अब दुनिया के शीर्ष 12 जैव प्रौद्योगिकी स्थलों में से एक माना जा रहा है। इसी तरह, वर्ष 2014 में 52 स्टार्टअप से पिछले 9 वर्षों में, अब हमारे पास 6,000 से अधिक बायोटेक स्टार्टअप हैं।”

विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री महोदय ने कहा कि जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी), जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी) और इसकी विभिन्न योजनाओं और पहलों के माध्यम से, स्टार्टअप, उद्यमियों, नवप्रवर्तकों, वैज्ञानिकों, प्रौद्योगिकी विशेषज्ञों, शिक्षाविदों को ट्रांसलेशनल अनुसंधान और नवाचार करने के लिए प्रोत्साहित करता है जिससे बड़े पैमाने पर जनता के लिए किफायती उत्पादों और प्रौद्योगिकियों का विकास होता है। जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी) की योजनाएं बायोटेक उद्यमों की स्थापना को प्रोत्साहित करती हैं। स्टार्टअप नवाचारों के मार्गदर्शन, वित्त पोषण, सत्यापन/पायलट परीक्षण और जैव प्रौद्योगिकी क्षेत्र में स्टार्टअप्स के लिए निवेशक जुड़ाव के लिए सहायता प्रदान की जाती है।

उन्होंने कहा, “जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी) के इनक्यूबेशन कार्यक्रम के माध्यम से हुई प्रगति में देश के 21 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जैव प्रौद्योगिकी उद्योग अनुसंधान सहायता परिषद (बीआईआरएसी) की बायोनेस्ट और ई-युवा (मूल्य वर्धित नवोन्मेषी ट्रांसलेशनल अनुसंधान के लिए युवाओं को सशक्त बनाना) की योजनाओं के माध्यम से समर्थित 75 इन्क्यूबेशन केंद्रों की स्थापना के अलावा लगभग बायोटेक इग्निशन ग्रांट (बीआईजी) के तहत समर्थित परियोजनाओं के माध्यम से 900 नवोन्वेषी केंद्र स्थापित करना शामिल है।”

इस अवसर पर अपने संबोधन में जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) के सचिव डॉ. राजेश एस गोखले ने कहा कि माइक्रोबायोम और जीनोम से संबंधित बड़े डेटा का उपयोग हमारी सेनाओं के लिए सटीक स्वास्थ्य और सटीक पोषण के लिए किया जा सकता है।

उन्होंने कहा, “इस संदर्भ में, क्षेत्रीय जैव प्रौद्योगिकी केंद्र (आरसीबी), फ़रीदाबाद में जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) द्वारा स्थापित भारतीय जैविक डेटा केंद्र द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं और विशेषज्ञता का उपयोग स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए बड़े डेटा एनालिटिक्स में सहयोग के लिए किया जा सकता है।”

प्रस्तावित सहयोग निम्नलिखित क्षेत्रों पर है:

(ए) सहयोगात्मक बायोमेडिकल अनुसंधान: जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) द्वारा वित्त पोषित संयुक्त अनुसंधान परियोजनाओं को शुरू करने के अवसरों का पता लगाना और अनुसंधान और प्रौद्योगिकी के संदर्भ में देश की जरूरतों की पहचान करने और पहचाने गए क्षेत्रों में सहयोग करने के उद्देश्य से मिलकर काम करेंगे।

(बी) संकाय विनिमय कार्यक्रम: दोनों पक्ष जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा (एएफएमएस) संस्थानों के बीच संकाय सदस्यों के बीच बातचीत के साथ-साथ विजिटिंग संकाय व्यवस्था की संभावना के अवसर तलाशेंगे।

(सी) संयुक्त शैक्षणिक गतिविधियां और कार्यक्रम: जैव प्रौद्योगिकी विभाग (डीबीटी) और सशस्त्र बल चिकित्सा सेवा (एएफएमएस) संस्थानों में आपसी हितों और उपलब्ध विशेषज्ञता के आधार पर लघु पाठ्यक्रम, संगोष्ठी, कार्यशालाएं और सम्मेलन जैसी संयुक्त शैक्षणिक गतिविधियां तैयार करेंगे।

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