Aacharya Shri 108 Antarmana Prasanna Sagar Ji Maharaj: अंतर्मना आचार्य श्री 108 प्रसन्न सागर जी महाराज (Prasanna Sagar Ji Maharaj) आज किसी पहचान के मोहताज नहीं हैं. 557 दिन की कठोर साधना के बाद 28 जनवरी 2023 लगभग 9 बजे सम्मेद शिखर पहाड़ से नीचे लौटे तो समूचा मधुबन प्रसन्न सागर के जयकारों से गूंज उठा. अंतर्मना (Antarmana) आचार्य श्री प्रसन्न सागर (Prasanna Sagar) को पालकी से नीचे लाया गया, लगभग 1:00 बजे आचार्य श्री की पालकी तलहटी पर आई, तो लोगों के सिरों से जैसे सड़के पट गई, हजारों की भीड़, मोक्ष सप्तमी से भी लगभग ज्यादा, आज शिखरजी को जैसे एक महामहोत्सव का रूप देने के लिए चरितार्थ कर चुकी थी.
आचार्य श्री की 557 दिन की दीर्घकालीन मौन साधना के बाद अब बारी थी अपने प्रवचन से सब को लाभान्वित करने की घंटों की ध्वनि, जंगली पशुओं की आवाजें, हाथी की चिंघाड़, चिड़िया की चू चू , कोयल की कू कू, मोर की आवाज, बादलों का गर्जना, फूलों का खिलना, सूरज का चमकना ,अंधेरे को चीरती रोशनी और दो माइकों के बीच आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी की आवाज होठों से निकलने को जैसे व्याकुल होती गई, 557 दिन से जीभ होठों की बनी दीवार को जैसे चीरने की कोशिश में आज गले से निकलने को आतुर थी और शुरुआत की मंगल पाठ णमोकार मंत्र से.
आचार्य श्री प्रसन्न सागर जी ने अपने इन 557 दिनों के अनुभवों को अपनी स्मरण शक्ति से, बाहर निकालते हुए बताया कि आचार्य पदम नंदी जी महाराज की वह पंक्ति जिसने उन्हें इस दीर्घकालीन महाव्रत के लिए प्रेरित किया, वह थी आत्मा मरता ही नहीं है तो डर किस बात का और फिर इतना बड़ा पर्वत, हवा, और हमारी परछाई के अलावा कुछ नहीं था ऊपर.
अपने अनुभव साझा करते हुए उन्होंने कहा कि तीन-चार उपवास के बाद ही उन्हें उल्टियां हुई, मल विसर्जन में तकलीफ होने लगी. तब आचार्य श्री संभव सागर जी को मैंने संदेशा भेजा, तो उन्होंने आर्यिका चैतन्यमति माताजी के साथ ,एक लौंग मंत्रित करके मेरे पास में हर पारणा में भेजनी शुरू कर दी और तब से आज तक मुझे, कोई दिक्कत नहीं हुई.
उन्होंने बताया कि 8 माह हो गए थे, उपवास करते करते , मैंने सिद्धवरकुट में आचार्य श्री विद्यासागर जी महामुनिराज के सामने संकल्प ले लिया था कि ना एसी कूलर आदि सभी का त्याग कर रहा हूं और मुझे गर्मी बहुत लगती है, तभी पता नहीं कहां से एक तरंग उठी और उसने संकेत दिया कि तुम्हें जब नीचे कुछ ना लेना है, ना देना है तो यहां क्या करते हो. ऊपर स्वर्णभद्र कूट पर जाकर तप त्याग की तपस्या करो और फिर सभी के सहयोग से मैं ऊपर तप करने लगा. उन्होंने कहा कि उपवास हम नहीं करते, गुरुवर करवाते हैं. शरीर जरूर हमारा है ,धड़कन गुरु की थी, रूप हमारा था पर स्वरूप उनका था.
आचार्य श्री ने एक और अनुभव साझा करते हुए बताया कि…………….. 26 जून को बहुत तेज धूप पड़ रही थी. पाटा बिछाकर संकल्प लेकर 2 घंटे के लिए ध्यान में मगन हो गए थे. तभी अचानक आंधी चली, तूफान चला, बारिश हुई और नींबू के आकार के लगातार ओले गिरने लगे. हम बेहोश हो गए और उस दिन का अजीब संयोग था कि कोई भी साथ नहीं था. तभी दो बच्चे सत्येंद्र और ईशान वहां आए और एक गार्ड भागीरथ, तीनों ने हमें उठाकर अंदर ले गए. आधे घंटे में तो फिर वहां पर भीड़ लग गई. आकाश एक डॉक्टर को लेकर आया, जिन्होंने बीपी चेक किया ऊपर 60 नीचे 20, पल्स 50 थी और सांस 72 थी और तभी डॉक्टर ने कहा, तुरंत नीचे ले जाना होगा, स्थिति ठीक नहीं है, गंभीर है.
डोली लेकर आओ, नीचे जाने के लिए वहां उनका कंपाउंडर भी मौजूद था और उसने कहा मैं एक सुई लगाकर कोशिश करता हूं. वह सुई की ऐसी आवाज, हमारे कानों में लटक गई, उसने हमारे कानों के जैसे पर्दों को फाड़ना शुरू कर दिया. मौन होते हुए भी हमारा संकेत उठा, हम उस बेहोशी से मानो उठ गए. इशारा करते-करते हमने बता दिया कि हम यहां इतनी तप त्याग कर रहे हैं और तुम सुई की बात कर रहे हो. बस जैसे हम मौत के मुंह से वापस आ गए.
महाराज जी ने बताया कि मैंने नीचे गुरुजी से संकल्प लिया था कि 61 ग्रंथ पडेंगे और मैंने वह संकल्प ऊपर पूरा भी किया. मैं रात में नहीं सोता था. आप सोचेंगे क्या करता था. जी हां स्वाध्याय करता था टॉर्च की रोशनी से, हां, विश्राम भी करता था तब, जब आप लोग वहां पर वंदना करने आते, यानी सुबह 6:00 से 11:00 तक मैं विश्राम करता.
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