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NMCG ने अर्थ गंगा के तहत ‘समुदाय और स्थानीय संसाधनों का लाभ उठाने के लिए प्रौद्योगिकी पर आधारित क्षमता निर्माण कार्यक्रम’ पर परियोजना शुरू की

राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन के महानिदेशक जी. अशोक कुमार ने अर्थ गंगा के तहत ‘समुदाय और स्थानीय संसाधनों का लाभ उठाने के लिए प्रौद्योगिकी पर आधारित क्षमता निर्माण कार्यक्रम’ पर परियोजना की शुरुआत की। इस अवसर पर हिमालयी पर्यावरण अध्ययन और संरक्षण संगठन (एचईएससीओ) के संस्थापक और पद्म विभूषण अनिल जोशी उपस्थित थे। यह परियोजना संयुक्त रूप से एनएमसीजी और एचईएससीओ के द्वारा कार्यान्वित की जा रही है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य अर्थ गंगा परियोजना के तहत गंगा नदी के किनारे स्थित स्थानीय समुदाय के बीच भविष्य के लिए नई जरूरत- आधारित कौशल विकसित करना और समुदाय के सदस्यों को वैकल्पिक समाधान प्रदान करना है।

इस अवसर पर जी. अशोक कुमार ने कहा, “अब तक नमामि गंगे, गंगा नदी के प्रदूषण को कम करने के लिए सीवरेज बुनियादी ढांचे के पर्याप्त निर्माण पर अथक रूप से काम कर रहा है। एनएमसीजी की प्राथमिकता गंगा और उसकी सहायक नदियों में प्रदूषित जल को गिरने से रोकना है और वह इन लक्ष्यों को सफलतापूर्वक प्राप्त कर रहा है। अब तक लगभग 973 मिलियन लीटर प्रति दिन (एमएलडी) की सीवेज शोधन क्षमता सृजित की जा चुकी है। नमामि गंगे कार्यक्रम के तहत सीवरेज प्रबंधन और अन्य गतिविधियों के अलावा अब ध्यान अर्थ गंगा पर है, जिसका 2019 में आयोजित राष्ट्रीय गंगा परिषद की पहली बैठक में प्रधानमंत्री ने अनुमोदन किया था। मुख्य रूप से अर्थ गंगा अर्थव्यवस्था के जरिए नदी से लोगों को जोड़ना है।”

अशोक कुमार ने बताया कि अर्थ गंगा के तहत लक्षित क्षेत्रों में से एक किसानों के बीच प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना रहा है। उन्होंने आगे कहा, “हमने शिरडी, बुलंदशहर, सोनीपत, हरिद्वार और मेरठ में कई किसानों के लिए प्रदर्शनी कार्यशाला व यात्राओं का आयोजन किया, जिसमें किसानों को प्राकृतिक खेती को अपनाने के लिए कहा गया।” अशोक कुमार ने कहा, “सहकार भारती के साथ हमारे समझौता ज्ञापन के एक हिस्से के रूप में अर्थ गंगा के तहत 75 गंगा सहकार ग्राम भी विकसित किए जाएंगे।”

एनएमसीजी ने वृद्धजनों और धार्मिक तीर्थयात्रियों की यात्रा को सुविधाजनक बनाने के लिए गंगा आरती और गंगा सेवकों के लिए स्थानीय लोगों को प्रशिक्षण देने की दिशा में काम करना शुरू कर दिया है। इसके अलावा जिम्मेदार पर्यटन और इकोसिस्टम के संरक्षण के लिए लोगों को प्रशिक्षण भी दिया जाएगा। वहीं, गंगा बेसिन में पारंपरिक ट्रेक (दुर्गम पद यात्रा) मार्गों के लिए पर्यटन गाइड तैयार किए जाएंगे। उन्होंने बताया कि भारतीय वन्यजीव संस्थान (डब्ल्यूआईआई) के साथ 26 स्थानों पर जलज आजीविका मॉडल शुरू किया गया है। अशोक कुमार ने कहा कि एनएमसीजी गंगा से जुड़े उत्पादों को नमामि गंगे और अर्थ गंगा के तहत एक ब्रांड के तौर पर बाजार में उतारने की तैयारी कर रहा है। इसके अलावा उन्होंने अप्रैल, 2022 से इन गतिविधियों की योजना बनाने और मुद्दों के समय पर समाधान के लिए जिला गंगा समितियों (डीजीसी) की नियमित बैठकों पर भी प्रसन्नता व्यक्त की।

पद्म भूषण अनिल जोशी ने कहा, “आज विश्व की सबसे बड़ी चुनौती गांवों में संसाधनों की कमी है, जिसके कारण विश्व के सभी देश मुश्किलों का सामना कर रहे हैं। सबसे बड़ी चुनौती गांव के संसाधनों की कमी को पूरा करना है। इसके लिए नमामि गंगे मिशन से पूरा सहयोग मिला है।” गांवों के महत्व के बारे में उन्होंने कहा कि भारत, साढ़े छह लाख गांवों का देश है और देश की नदियां हमेशा गांवों से जुड़ी रही हैं। वहीं, नमामि गंगे मिशन के बारे में उन्होंने कहा कि लोगों को गंगा से जोड़ने की दिशा में मिशन उत्कृष्ट काम कर रहा है। अनिल जोशी कहा कि इस मिशन की अर्थ गंगा परियोजना बहुत ही गंभीर और सामयिक पहल है और इससे जुड़ना सम्मान की बात है।

अनिल जोशी इस मिशन के दीर्घकालीन होने पर जोर दिया। उन्होंने कहा, “इसके लिए कदम उठाए जाने चाहिए, जिससे 10 या इससे अधिक वर्षों के बाद भी नमामि गंगे नदी के कायाकल्प के लिए एक मॉडल के रूप में बनी रहे और आने वाली पीढ़ियों को पता हो कि इसने गंगा संरक्षण में अपनी एक अभूतपूर्व भूमिका निभाई है। गंगा का कायाकल्प इस देश के हर एक व्यक्ति के लिए पूरे जीवन की प्रतिबद्धता है।”

अर्थ गंगा के तहत ‘समुदाय और स्थानीय संसाधनों का लाभ उठाने के लिए प्रौद्योगिकी पर आधारित क्षमता निर्माण कार्यक्रम’ पर परियोजना का उद्देश्य इकोलॉजिकल पूर्वधारणाओं के माध्यम से गंगा बेसिन के स्थानीय समुदायों के आर्थिक उन्नति की दिशा में काम करके उन्हें सशक्त बनाना है। इसके अलावा इस परियोजना में अर्थ गंगा केंद्र (एजीसी) और तीन गंगा संसाधन केंद्र (जीआरसी) स्थापित करने की भी परिकल्पना की गई है। यह कार्यक्रम नवीनतम तकनीकों का भी स्रोत होगा और समुदाय के लिए आर्थिक और इकोलॉजिकल रूप से व्यावहारिक पहलों का प्रसार करेगा। इस परियोजना के तहत 4 राज्यों- उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और झारखंड में समुदायों के लिए क्षमता निर्माण कार्यशालाओं/प्रशिक्षणों का आयोजन एचईएससीओ के प्रमुख प्रशिक्षकों के मार्गदर्शन में जीआरसी केंद्रों के जरिए किया जाएगा।

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