राष्ट्रीय मानव अधिकार आयोग (एनएचआरसी), भारत ने विधवाओं के कल्याण और उनके मानव अधिकारों का संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों एवं केंद्रशासित प्रदेश प्रशासन के सरकारी अधिकारियों को परामर्शी जारी की है। आयोग को परामर्शी जारी करने की आवश्यकता महसूस हुई क्योंकि आयोग ने देखा कि विधवा महिलाओं को, अपने जीवनसाथी को खोने के भावनात्मक संकट के अलावा, अक्सर कई अन्य चुनौतियों का भी सामना करना पड़ता है, बल्कि यह सामाजिक बहिष्कार, आय की हानि और यहां तक कि निवास की समस्या तक सीमित नहीं है।
आयोग ने कहा कि 2011 की जनगणना के आंकड़ों के अनुसार, भारत में 5.6 करोड़ विधुर/विधवाओं की कुल आबादी में महिलाएं लगभग 78% हैं। विधवा महिलाओं को अक्सर अपने जीवनसाथी के निधन के बाद खुद की देखभाल के लिए छोड़ दिया जाता है। अपने परिवारों से पर्याप्त मदद के बिना और वित्तीय आत्मनिर्भरता की कमी के कारण, उन्हें समुदाय से अलग-थलग कर दिया जाता है, यहां तक कि उन्हें अपने घर छोड़ने और आश्रय घरों/आश्रमों में शरण लेने के लिए मजबूर किया जाता है। निरक्षरता की व्यापकता और बढ़ती उम्र ने उनकी आर्थिक स्थिति को और खराब कर दिया है।
इसलिए, विधवा महिलाओं के समग्र कल्याण पर विचार करते हुए, एनएचआरसी, भारत ने जारी परामर्शी सलाह में केंद्र, राज्यों और केंद्रशासित प्रदेश प्रशासनों द्वारा कार्रवाई के लिए 10 प्रमुख क्षेत्रों और अन्य उपायों पर ध्यान केंद्रित किया है। इनमें उनके उचित पहचान दस्तावेजों को सुनिश्चित करना, उनके लिए आश्रय घरों का निर्माण और रखरखाव, संपत्ति तक समान पहुंच; अपने घरों से बेदखल होने की रोकथाम और शोषण से सुरक्षा, कौशल विकास का प्रावधान और स्थायी आजीविका तक पहुंच, आसान बैंकिंग और वित्तीय स्वतंत्रता तक पहुंच, स्वास्थ्य देखभाल की पहुंच, सामर्थ्य और उपलब्धता, मानसिक स्वास्थ्य, समुदाय-आधारित नेटवर्क, निराश्रित विधवाओं के मुद्दों के बारे में डेटा की कमी, साहित्य का सदुपयोग तथा पहले दिए गए सुझावों के आधार पर 17वीं लोकसभा में सांसद श्री जनार्दन सिंह सिग्रीवाल द्वारा पेश किए गए विधवा (संरक्षण और भरण-पोषण) विधेयक, 2015′ की समीक्षा करना और साथ ही उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के तहत गठित समिति की 2017 की रिपोर्ट की समीक्षा करना शामिल है, ताकि विधवाओं के कल्याण हेतु कानून बनाया/लाया जा सके।
कुछ अन्य प्रमुख सिफ़ारिशें इस प्रकार हैं;
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के साथ-साथ सभी संबंधित राज्य विभाग अपनी वेबसाइटों पर विधवाओं के लिए सभी सरकारी संचालित आश्रय घरों का एक केंद्रीकृत डेटाबेस उपलब्ध कराएं;
केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय उन्हें रोजगार और वित्तीय आत्मनिर्भरता प्राप्त करने में मदद करने के लिए स्वास्थ्य, मनोरंजन और कौशल विकास सुविधाओं सहित उनके रहने की स्थिति की निगरानी करने के लिए इन आश्रमों और आश्रय घरों का त्रैमासिक दौरा करने के लिए जिला स्तर पर एक टीम तैनात करनी चाहिए;
कलेक्टर एवं जिला मजिस्ट्रेट/उपायुक्त को भोजन, आश्रय, सम्मान और संपत्ति की सुरक्षा के संबंध में विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के कार्यान्वयन के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए;
प्रत्येक जिले में एक समर्पित “विधवा सेल” का गठन किया जाना चाहिए जो विधवाओं के लिए योजनाओं के लिए सिंगल विंडो के रूप में काम कर सके;
विधवा सेल के साथ सभी आश्रय गृहों का पंजीकरण सुनिश्चित किया जाना चाहिए और इनमें उनकी क्षमता से अधिक भीड़ न हो;
आवंटित सार्वजनिक और निजी आश्रय गृहों में और उसके आसपास रहने वाली सभी विधवाओं के आधार कार्ड बनाए जाने चाहिए ताकि उन्हें विभिन्न योजनाओं के लाभों की निगरानी सुनिश्चित की जा सके;
विधवाओं को सामाजिक कल्याण योजनाओं के लाभों तक पहुंचने में सक्षम बनाने के लिए उचित पहचान पत्र प्रदान किया जाना चाहिए और यह सुनिश्चित करें कि विवाह पंजीकरण प्रमाण पत्र के अभाव में उन्हें इससे वंचित नहीं किया जाए;
कानूनी सहायता प्रदान करके और इस अधिकार के बारे में उनके बीच जागरूकता पैदा करके संपत्ति के उत्तराधिकार के उनके कानूनी अधिकार का उचित कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जाना चाहिए;
उन्हें न्यू इंडिया लिटरेसी प्रोग्राम (एनआईएलपी) जैसे शिक्षा कार्यक्रमों और वित्तीय साक्षरता सहित कम से कम मूलभूत साक्षरता देने के लिए अन्य कार्यक्रमों में नामांकित करने का प्रयास किया जाना चाहिए। आश्रय गृह और आश्रमों में विधवाओं को प्रोत्साहित करने और शिक्षा प्रदान करने के लिए स्थानीय गैर सरकारी संगठनों के साथ साझेदारी कर सकते हैं;
विधवाओं को उनके स्व-रोजगार और उद्यमशीलता गतिविधियों के लिए स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) के निर्माण को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए;
संबंधित एजेंसियों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी विधवाओं के पास प्रधान मंत्री जन धन योजना के तहत एक व्यक्तिगत बैंक खाता हो;
मानसिक स्वास्थ्य सहायता और देखभाल की आवश्यकता वाली विधवाओं के लिए, विशेष देखभाल की व्यवस्था की जानी चाहिए तथा उनको इससे रिकवरी करने में सक्षम किया जाना चाहिए;
विधवाओं को जिम्मेदारी का भाव देने तथा बच्चों के जीवन कौशल को बढ़ाने हेतु, आंगनबाड़ियों, अनाथालयों और प्राथमिक विद्यालयों में विधवाओं के ज्ञान और अनुभवों के उपयोग हेतु प्रोत्साहित करना चाहिए;
पुनर्विवाह या साथी ढूंढने की इच्छुक विधवाओं को उपयुक्त एजेंसियों/एनजीओ से जोड़ा जाना चाहिए;
यदि विवाह या रिश्ता विफल हो जाता है, या पति या पत्नी या साथी की मृत्यु हो जाती है, तो विधवा के पास नई औपचारिकताओं से गुजरे बिना आश्रय गृह में लौटने का विकल्प होना चाहिए;
राज्य सरकार विधवा पुनर्विवाह के लिए मौजूदा योजनाओं के तहत भी विवाह के लिए उपयुक्त धनराशि प्रदान की जानी चाहिए;
परित्यक्त विधवाओं की दुर्दशा से निपटने के लिए उपयुक्त कानून की आवश्यकता है, जैसे कि सती प्रथा के खिलाफ;
आश्रय घरों और आश्रमों को उन्हें आवश्यक सहायता प्रदान करने के लिए गैर सरकारी संगठनों और जिला कानूनी सेवा प्राधिकरण (डीएलएसए) से जोड़ना चाहिए;
विधवाओं का अंतिम संस्कार आश्रय गृहों/आश्रमों द्वारा सम्मानजनक तरीके से किया जाना चाहिए। इसे निराश्रित विधवाओं के रीति-रिवाजों और आस्था के अनुसार किया जाना चाहिए;
यदि आवश्यक हो तो पंचायतों और नगर निकायों में क्षैतिज आरक्षण प्रदान करके निराश्रित विधवाओं को सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए;
विधवाओं के अनुरूप गरीबी संकेतक विकसित किए जाने चाहिए। विधवाओं के सामने आने वाली चुनौतियों को समझने के लिए गुणात्मक डेटा तैयार किया जाना चाहिए।
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