केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार), डॉ. जितेंद्र सिंह ने आज ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (टीएचएसटीआई) के 16वें स्थापना दिवस के अवसर पर संस्थान का दौरा किया। उन्होंने अपनी तरह के पहले “चिकित्सा अनुसंधान केंद्र” (एमआरसी) में चल रहे कार्यों का जायजा लिया। यह प्रमुख बुनियादी ढांचा परियोजना है जिसका उद्देश्य भारत की नैदानिक अनुसंधान क्षमताओं को मजबूत करना है।
जैव प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत स्वायत्त संस्थान टीएचएसटीआई, चिकित्सा अनुसंधान केंद्र की स्थापना के अंतिम चरण में है। यह बहुमंजिला केंद्र है, जिसे उन्नत नैदानिक अध्ययनों को समर्थन देने के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें आंत्र संक्रमण, श्वसन संक्रमण आदि के अध्ययन के लिए समर्पित अलग-अलग विशेष खंड हैं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने इस दौरान भवन का निरीक्षण किया, जो अब बनकर तैयार हो चुका है। उन्होंने उपकरणों की स्थापना और संचालन की तैयारी की स्थिति की समीक्षा भी की।
नए केंद्र में अन्य प्रमुख क्षेत्रों के अलावा, आंत्र और श्वसन संक्रमणों पर अनुसंधान के लिए विशेष खंड होंगे। एक बार चालू हो जाने पर, यह नैदानिक अवलोकन अध्ययनों और परीक्षणों को सुगम बनाने में सक्षम होगा, जिसमें निदान और उपचार पर कार्य भी शामिल है। एमआरसी में नियंत्रित मानव संक्रमण इकाई भी होगी। यह इस क्षेत्र की कुछ प्रमुख सुविधाओं में से एक है जिसका उद्देश्य संक्रामक रोग अनुसंधान में तेजी लाना है।
टीएचएसटीआई समुदाय को संबोधन में डॉ. जितेंद्र सिंह ने संस्थान की प्रगति और जन स्वास्थ्य नवाचार में निरंतर योगदान की सराहना की। उन्होंने कहा, ” मैं प्रत्येक वर्ष ट्रांसलेशनल स्वास्थ्य विज्ञान में आपकी प्रगति से और अधिक प्रभावित होता हूँ।” उन्होंने यह भी कहा कि टीएचएसटीआई इस बात का उदाहरण है कि कैसे अनुसंधान संस्थान वैज्ञानिक खोज और वास्तविक दुनिया में अनुप्रयोग के बीच की खाई को पाट सकते हैं।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कोविड-19 महामारी के दौरान, विशेष रूप से टीका विकास और प्रतिरक्षा संबंधी अध्ययनों में, टीएचएसटीआई की महत्वपूर्ण भूमिका को याद किया। इस संस्थान ने शुरुआती डीएनए टीका परीक्षणों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और सुव्यवस्थित वैज्ञानिक अध्ययनों के माध्यम से वायरस और उसके संचरण पैटर्न को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने कहा कि उद्योग के साथ साझेदारी में किए गए ये प्रयास भारत की जन स्वास्थ्य प्रतिक्रिया को दिशा देने में सहायक रहे।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने पिछले वर्ष टीएचएसटीआई की कई उपलब्धियों की भी जानकारी दी। इनमें निपाह वायरस के विरुद्ध शक्तिशाली मोनोक्लोनल एंटीबॉडी का विकास शामिल है जो निम्न और मध्यम आय वाले देश की तुलना में महत्वपूर्ण प्रगति है। सीईपीआई ने प्री-क्लिनिकल नेटवर्क प्रयोगशाला के रूप में संस्थान का चयन किया है, जो एशिया में पहला और विश्व स्तर पर नौवां ऐसा संस्थान है। यह मान्यता उच्च जोखिम वाले रोगजनकों से निपटने और वैश्विक महामारी की तैयारियों में योगदान देने की टीएचएसटीआई की क्षमता को रेखांकित करती है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने प्रायोगिक पशु सुविधा के विस्तार का उल्लेख किया, जो अब देश में सबसे बड़ी सुविधाओं में से एक है। उन्होंने आनुवंशिक रूप से परिभाषित मानव संबद्ध माइक्रोबियल संस्कृति संग्रह (जीई-ह्यूमिक) के निर्माण का भी उल्लेख किया। यह ऐसा संसाधन है जो मानव माइक्रोबायोम और संक्रामक रोगों में अनुसंधान का समर्थन करेगा।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने भारत के वैज्ञानिक और चिकित्सा अनुसंधान बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देने में आगामी चिकित्सा अनुसंधान केंद्र और उससे सटे ट्रांसलेशनल रिसर्च फैसिलिटी (टीआरएफ) की भूमिका के बारे में बात की। टीआरएफ टीकों, मोनोक्लोनल एंटीबॉडी, डायग्नोस्टिक्स और बायोथेरेप्यूटिक्स पर काम का समर्थन करेगा। उन्होंने कहा कि उद्योग और शिक्षा जगत के साथ साझेदारी के माध्यम से कई उत्कृष्टता केंद्रों की मेजबानी करने की उम्मीद है।
डॉ. जितेंद्र सिंह ने कल आयोजित SYNCH-N 2025 कार्यक्रम का जिक्र किया। उन्होंने सार्वजनिक-निजी सहयोग पर टीएचएसटीआई के बल देने के महत्व को स्वीकार किया, जहाँ लगभग 18 आशय पत्रों और समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। उन्होंने कहा कि ये सहयोग अनुसंधान को सुलभ स्वास्थ्य सेवा समाधानों में बदलने में सहायक होंगे।
एकीकृत और सहयोगात्मक दृष्टिकोण के महत्व को दोहराते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “आपका कार्य स्वस्थ और अधिक लचीले भारत में सीधे योगदान दे रहा है।”
टीएचएसटीआई के 16वें स्थापना दिवस के अवसर पर चिकित्सा अनुसंधान केंद्र का निर्माण पूरा होने से संस्थान के लिए नए अध्याय की शुरुआत हुई है। उन्नत बुनियादी ढाँचे और अनुवाद विज्ञान पर निरंतर ध्यान केंद्रित करने के साथ, टीएचएसटीआई अनुसंधान और नवाचार के माध्यम से स्वास्थ्य सेवा को आगे बढ़ाने के भारत के प्रयासों का महत्वपूर्ण अंग बना हुआ है।
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