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सरकारी खरीद और बाजार में बिक्री का संतुलन किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के लिए फायदेमंद

देश भर में गेहूं किसानों को उच्च बाजार दरों से लाभ हुआ क्योंकि ज्यादातर/अधिकांश किसानों ने अपनी उपज को एमएसपी की तुलना में उच्च बाजार दर पर निजी व्यापारियों को बेचा। तदनुसार, किसान अपनी उपज के लिए उच्च पारिश्रमिक प्राप्त कर सकते हैं जो कि किसानों के कल्याण के लिए सरकार की नीति का मुख्य उद्देश्य है। मौजूदा स्थिति, जहां किसानों को अपनी उपज बेचने के लिए अधिक विकल्प उपलब्ध कराए गए थे, से उन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी बेहतर विकल्प चुनने का अधिकार मिला। यह पाया गया है कि इस मौसम में किसानों ने अपनी उपज औसतन 2150 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से बेची है और इस तरह एमएसपी की तुलना में खुले बाजार में अपनी उपज बेचने पर उन्हें अधिक कमाई हुई है। इसी तरह, 444 लाख एमटी की अनुमानित खरीद पर, किसानों ने 2150 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से औसतन लगभग 95,460 करोड़ रुपये कमाया होगा जबकि एमएसपी पर 2015 रुपये प्रति क्विंटल के भाव से कमाई 89,466 करोड़ रुपये ही हुई होती। इस प्रकार गेहूं किसानों को एमएसपी की तुलना में कुल मिलाकर 5994 करोड़ रुपये अधिक कमाई हुई होगी।

सरकारी खरीद में गिरावट का कारण निजी व्यापारियों द्वारा गेहूं की काफी अधिक खरीद रही है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में गेहूं की कीमत मौजूदा भू-राजनीतिक स्थितियों के कारण अंतरराष्ट्रीय मांग-आपूर्ति बिगड़ने की वजह से बढ़ी है। पूरे देश में खरीद अवधि के दौरान गेहूं का बाजार मूल्य एमएसपी से लगातार अधिक यानी लगभग 2100/- से 2500/- रुपये प्रति क्विंटल रहा है।

चालू सीजन में गेहूं की खरीद में 58 प्रतिशत की कमी आई है, जो 444 लाख मीट्रिक टन के शुरुआती अनुमान से काफी कम है। सीजन के अंत तक आरएमएस 2022-23 के दौरान गेहूं की खरीद के 190 लाख मीट्रिक टन तक ही पहुंचने की उम्मीद है।

वर्तमान आरएमएस 2022-23 के शुरू होने से पहले फरवरी 2022 में हुई राज्य खाद्य सचिवों की बैठक में लिये गये निर्णय के आधार पर गेहूं खरीद का अनुमान 444 लाख मीट्रिक टन रखा गया था। आरएसएम 2021-22 के दौरान पिछले साल गेहूं की कुल खरीद 433.44 लाख मीट्रिक टन थी।

केंद्र सरकार द्वारा आरएमएस 2022-23 के लिए गेहूं के एमएसपी की घोषणा अग्रिम रूप से सितंबर 2021 में ही कर दी गई जिसमें सीएसीपी की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुए 40/- प्रति क्विंटल (2%) का इजाफा किया गया। इसके साथ 1975/- रुपये प्रति क्विंटल से गेहूं का एमएसपी 2015/- प्रति क्विंटल हो गया। गेहूं के एमएसपी में वर्ष 2013-14 (1350 रुपये प्रति क्विंटल) की तुलना में 2022-23 (रु. 2015/क्विंटल) तक लगभग 49% की वृद्धि हुई है।

घरेलू मोर्चे पर, देश के पास वर्तमान में और साथ ही अगले वर्ष के लिए गेहूं और चावल का अतिरिक्त स्टॉक उपलब्ध है। राज्य सरकारों के साथ व्यापक परामर्श के बाद, भारत सरकार ने पीएमजीकेएवाई और एनएफएसए के तहत गेहूं के प्रावधान को फिर से आवंटित किया है, जिससे 55+62=117 एलएमटी गेहूं आवंटित कर दिया गया है। 01.04.2023 तक अनुमानित गेहूं स्टॉक की स्थिति लगभग 141 एलएमटी होगी जो कि वर्ष 2022-23 के लिए एनएफएसए, पीएमजीकेएवाई और अन्य कल्याण योजनाओं के तहत सभी आवश्यकताओं को पूरा करने के बाद 75 एलएमटी के स्टॉकिंग मानदंडों के अनुसार न्यूनतम आवश्यकता का लगभग दो गुना है। इसी तरह चावल की उपलब्धता भी सरप्लस होगी।

किसानों को उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करने के लिए, फसलों के बुवाई के मौसम की शुरुआत में भारत सरकार द्वारा 22 अनिवार्य कृषि फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित किया जाता है। फसलों के एमएसपी को कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) की सिफारिशों के आधार पर अंतिम रूप दिया जाता है जिसे खेती में आने वाली लागत और किसानों के लाभ को ध्यान में रखते हुए निर्धारित किया जाता है। एमएसपी की सिफारिश करते समय, सीएसीपी उत्पादन की लागत, समग्र मांग-आपूर्ति की स्थिति, घरेलू और अंतर्राष्ट्रीय मूल्य, अंतर-फसल मूल्य समता, कृषि और गैर-कृषि क्षेत्रों के बीच व्यापार की शर्तों, शेष अर्थव्यवस्था पर संभावित प्रभाव जैसे महत्वपूर्ण कारकों पर विचार करता है। इसके अलावा इसमें भूमि, पानी और अन्य उत्पाद संसाधनों का तर्कसंगत उपयोग और उत्पादन की लागत पर किसानों के लिए मार्जिन के रूप में न्यूनतम 50 प्रतिशत सुनिश्चित किया जाता है।

देश भर में एफसीआई और राज्य सरकार की एजेंसियों द्वारा गेहूं की खरीद के लिए एक पारदर्शी और समान नीति मौजूद है। किसी भी राज्य में, निर्धारित खरीद अवधि के भीतर और भारत सरकार द्वारा निर्धारित विनिर्देशों के अनुरूप किसानों द्वारा बेची जाने योग्य अधिशेष उपज सरकारी एजेंसियों द्वारा केंद्रीय पूल के लिए एमएसपी पर खरीदी जाती है। हालांकि, अगर किसी उत्पादक/किसान को एमएसपी की तुलना में बेहतर कीमत मिलती है, तो वह अपनी उपज को खुले बाजार में बेचने के लिए स्वतंत्र है। सरकारी खरीद में महत्वपूर्ण योगदान के साथ देश में गेहूं खरीदने वाले प्रमुख राज्य पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और राजस्थान हैं।

भारत सरकार ने 13.05.2022 से गेहूं के निर्यात को नियंत्रित किया है जिससे बाजार की गतिशीलता पर अंकुश लगा, गेहूं के सट्टा व्यापार पर रोक लगी और घरेलू बाजार में गेहूं और गेहूं से बने सामानों की कीमत में बढ़ोतरी की प्रवृत्ति पर रोक लगी। यह सुनिश्चित करने के लिए कि निर्यात विनियमन के कारण अधिशेष गेहूं वाले कोई किसान प्रभावित न हों, भारत सरकार ने सामान्य रूप से गेहूं खरीद के सीजन को बढ़ा दिया। खरीद सीजन में इस विस्तार से उन किसानों को सहुलियत हुई जिन्होंने पहले सरकारी खरीद में भाग नहीं लिया था, और एफसीआई एवं राज्य की खरीद एजेंसियों को उनके खरीद केंद्रों पर गेहूं बेचने के लिए अपने पास गेहूं का स्टॉक रखे थे। इसके अलावा, पंजाब और हरियाणा के किसानों को गर्मी की शुरुआत और बेमौसम गर्मी की लहर के कारण गेहूं की फसल की उपज में गिरावट के कारण उनकी तकलीफों को कम करने और केंद्रीय पूल के लिए खरीद को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने पंजाब और हरियाणा राज्यों में सूखे अनाज की अनुमत सीमा को 6% से बढ़ाकर 18% कर दी है। राज्य सरकारों से भी अनुरोध किया गया था कि वे अधिक से अधिक किसानों को खरीद कार्यों में भाग लेने के लिए आमंत्रित करके अधिक सक्रिय तरीके से खरीद की सुविधा प्रदान करें ताकि वे एमएसपी का लाभ उठा सकें। फिर भी, सरकारी खरीद के लिए मंडियों में गेहूं की आवक कम रही जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि किसानों को एमएसपी से बेहतर मूल्य मिल रहे थे और वे सीधे निजी खरीदारों को उच्च दरों पर गेहूं बेचने में सक्षम थे।

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