प्रमुख बिंदु:
रक्षा सम्पदा महानिदेशक (डीजीडीई) ने पूरे भारत में रक्षा भूमि का सफलतापूर्वक डिजिटलीकरण किया
18 लाख एकड़ से अधिक सम्पदा के साथ, डीजीडीई सरकारी भूमि के सबसे बड़े भूमि प्रबंधकों में से एक
हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) ने इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया है
रक्षा सचिव डॉ. अजय कुमार ने भारतीय रक्षा सम्पदा सेवाओं (आईडीईएस) के अधिकारियों और रक्षा सम्पदा महानिदेशालय (डीजीडीई) के तकनीकी कर्मचारियों के लिए सुदूर संवेदन व भौगोलिक सूचना प्रणाली का उपयोग करके नवीनतम सर्वेक्षण तकनीकों और रक्षा भूमि सीमाओं के मानचित्रण पर एक प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन किया। इस प्रशिक्षण का पहला बैच हैदराबाद स्थित राष्ट्रीय सुदूर संवेदन केंद्र (एनआरएससी) में शुरू हुआ। वहीं, इस कार्यक्रम का उद्घाटन नई दिल्ली से वीडियो कॉन्फ्रेंस के जरिए किया गया।
इस कार्यक्रम का उद्देश्य देश के प्रमुख संस्थानों के माध्यम से रक्षा सम्पदा संगठन के तकनीकी संसाधनों को नवीनतम तकनीकों में प्रशिक्षित करना और भूमि के सर्वेक्षण व संरक्षण के लिए घरेलू क्षमता उत्पन्न करना है। इस कार्यक्रम के माध्यम से प्रशिक्षुओं को सैटेलाइट इमेजरी प्रोसेसिंग, ड्रोन इमेजरी प्रोसेसिंग आदि जैसी आधुनिक तकनीकों में नए कौशल का अनुभव होगा। इसके अलावा छावनी बोर्डों के कंप्यूटर प्रोग्रामरों सहित डीजीडीई संगठन के सभी तकनीकी संवर्ग (कैडर) को बैचों में प्रशिक्षण देने का प्रस्ताव है। उपमंडल के अधिकारियों के पहले बैच को 18 अक्टूबर, 2021 से हैदराबाद स्थित एनआरएससी में दो हफ्ते के लिए प्रशिक्षित किया जा रहा है।
इस प्रशिक्षण कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए रक्षा सचिव ने अधिकारियों से रक्षा भूमि के सर्वेक्षण में नवीनतम तकनीकों के साथ खुद को अपडेट रखने का आग्रह किया। उन्होंने रक्षा भूमि के सर्वेक्षण में प्रौद्योगिकी का उपयोग करने की जरूरत पर भी जोर दिया।
इस अवसर पर रक्षा सचिव ने कहा, “18 लाख एकड़ से अधिक सम्पदा के साथ, डीजीडीई देश में सरकारी भूमि के सबसे बड़े भूमि प्रबंधन संगठनों में से एक है। साथ ही, ये विभिन्न प्रकार की भूमि है। इसके कुछ हिस्से में शहरी भूमि शामिल है, वहीं अन्य दूरदराज के और कुछ दुर्गम इलाकों में से हैं। इन बातों को देखते हुए यह देखना बेहद खुशी की बात है कि डीजीडीई आधुनिक तकनीकों को अपना रहा है और यह निश्चित रूप से भूमि प्रबंधन प्रणाली की गुणवत्ता में सुधार करेगा।”
रक्षा सचिव ने डीजीडीई के रक्षा भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण को सफलतापूर्वक पूरा करने का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इसके जरिए रक्षा भूमि में सार्वजनिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं जैसे सड़क, रेल लाइन और विद्युत परियोजनाओं आदि के लिए अन्य संगठनों की जरूरत पर आसानी से बातचीत की जा सकती है। उन्होंने आगे कहा कि इससे पट्टों के नवीनीकरण की प्रक्रिया में भी आसानी हो सकती है। डॉ. अजय कुमार ने डीजीडीई के प्रयासों को भी रेखांकित किया, जिससे किसी भी उल्लंघन या अतिक्रमण के मामले में कोई सुधारात्मक कार्रवाई की जा सके। इन प्रयासों में जमीन में होने वाले बदलावों पर नजर रखने के लिए उपग्रहों के माध्यम से निगरानी प्रणाली विकसित करना शामिल है।
रक्षा सचिव ने उम्मीद व्यक्त की कि प्रशिक्षण पूरा होने के बाद अधिकारी न केवल डीजीडीई के चालू भूमि सर्वेक्षण को शीघ्र पूरा करने के लिए इन नई तकनीकों को अपनाएंगे, बल्कि डीजीडीई के इस प्रयास को सर्वोत्तम अभ्यासों में से एक के रूप में स्थापित भी करेंगे, जिससे कि इसका अनुपालन अन्य मंत्रालय और विभाग भी कर सकें।
पहले बैच के प्रशिक्षण का उद्देश्य प्रशिक्षुओं को मुख्य रूप से सुदूर संवेदन, फोटो की विवेचना, डिजिटल फोटो बुनियादी तत्व और रेडियोमेट्रिक संवर्द्धन, फोटो का भौगोलिक-संदर्भीकरण, चित्र प्रदर्शन व समायोजन प्रणाली, भौगोलिक सूचना प्रणाली (जीआईएस) का परिचय, डेटा रूपांतरण तकनीक, त्रुटि का पता लगाना, स्थानिक डेटाबेस का संपादन व सत्यापन, मानचित्र संरचना और उपरोक्त विषयों से संबंधित प्रायोगिक सत्र में प्रशिक्षित करना है।
अगले चरण में, आईडीईएस अधिकारियों को नवीनतम तकनीकों से परिचित कराने के लिए एक हफ्ते का प्रशिक्षण नवंबर, 2021 में आयोजित करने की योजना है। यह आईडीईएस अधिकारियों और कर्मचारियों के लिए एक सतत अभ्यास होगा जब तक कि दिल्ली में डीजीडीई का अपना प्रशिक्षण संस्थान (एनआईडीईएम) इस तरह के प्रशिक्षण को प्रदान करने के लिए अपनी क्षमता विकसित नहीं कर लेता।
रक्षा सम्पदा संगठन ने 2011-2015 (चरण I) के दौरान रक्षा भूमि का व्यापक सर्वेक्षण किया था। अब पहले चरण के सर्वेक्षण के परिणामों को सत्यापित करने, प्रमाणित करने और मिलान करने के लिए चरण-II सर्वेक्षण किया गया है और यह पूरा होने के अंतिम चरण में है। कुछ समय पहले तक ईटीएस और डीजीपीएस के जरिए सर्वेक्षण किया जा रहा था। इस पद्धति में समय लगता है और सर्वेक्षण समाप्त होने तक ऐसे सर्वेक्षणों के परिणाम पुराने भी हो सकते हैं।
अब यह निर्णय लिया गया है कि सर्वेक्षण के अधिक सटीक, प्रमाणित, विश्वसनीय, मजबूत और समयबद्ध परिणामों के लिए भूमि सर्वेक्षण की नवीनतम तकनीकों के साथ-साथ डेटा प्रसंस्करण जैसे; उपग्रह इमेजरी, ड्रोन आधारित सर्वेक्षण और डेटा प्रोसेसिंग उपकरण को अपनाया जाना चाहिए। ये तकनीकें जमीन पर होने वाले बदलावों जैसे कि अतिक्रमण या भूमि को जोतना व बेहतर योजना की निगरानी में भी सक्षम होंगी। इस उद्देश्य के लिए महाजन फील्ड फायरिंग रेंज (बीकानेर, राजस्थान) का ड्रोन आधारित सर्वेक्षण करने के लिए कदम उठाए गए हैं, जो कि प्रगति पर है। इसी तरह, पोखरण फील्ड फायरिंग रेंज का सैटेलाइट इमेजरी-आधारित सर्वेक्षण का भी काम जारी है। वहीं, अतिक्रमण का पता लगाने के लिए टोम सीरीज सैटेलाइट इमेजरी पर आधारित रीयल टाइम चेंज डिटेक्शन सिस्टम (वास्तविक समय परिववर्तन खोज प्रणाली) के लिए तीसरी परियोजना भी प्रगति पर है।
इस उद्घाटन कार्यक्रम में रक्षा संपदा के निदेशक अजय कुमार शर्मा, रक्षा मंत्रालय में अतिरिक्त सचिव निवेदिता शुक्ला वर्मा, रक्षा मंत्रालय में संयुक्त सचिव राकेश मित्तल, एनआरएससी के निदेशक डॉ. राज कुमार और रक्षा मंत्रालय में निदेशक शर्मिष्ठा मैत्रा भी उपस्थित थीं।
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