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भारत विश्व की ‘चक्रीय अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी)’ में प्रमुख योगदानकर्ता बनने के लिए तैयार है: केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह

केंद्रीय मंत्री डॉ जितेंद्र सिंह ने आज कहा कि भारत विश्व की “चक्रीय अर्थव्यवस्था (सर्कुलर इकोनॉमी)” में एक प्रमुख योगदानकर्ता बनने के लिए तैयार है।

नई दिल्ली में ” एक सप्ताह – एक प्रयोगशाला (वन वीक- वन लैब)” कार्यक्रम के तहत वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद – भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (सीएसआईआर आईआईपी) के सूक्ष्म लघु एवं माध्यम उद्यम सम्मेलन (एमएसएमई मीट) और समग्र (पैन) सीएसआईआर- सहयोग को संबोधित करते हुए, डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत में अब तक अप्रयुक्त अपशिष्ट की एक ऐसी बड़ी मात्रा है जो संपदा में परिवर्तित करने के लिए उपलब्ध है और जिसका पहले उपयोग नहीं किया जा सका था क्योंकि तब न तो ऐसी तकनीक उपलब्ध थी, न ही इसे हमारी सामाजिक संस्कृति के हिस्से के रूप में लाया गया था। लेकिन प्रौद्योगिकी विकास की बढ़ती गति और अधिक से अधिक सामाजिक जागरूकता के साथ, यह अर्थव्यवस्था का एक समृद्ध स्रोत बन जाएगा जो भारत के लिए विशिष्ट होगा। उन्होंने कहा कि इसके अलावा, यह भारत को अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं पर बढ़त देगा।

मंत्री महोदय ने इस बात पर प्रकाश डाला कि “अपशिष्ट (कचरा) आने वाले समय की संपदा है” और यह प्रधानमंत्री नरेन्‍द्र मोदी के वैश्विक पर्यावरणीय कार्रवाई के केंद्र में भारत की परिकल्पना के अनुरूप है।

मंत्री महोदय ने उल्लेख किया कि सीएसआईआर- आईआईपी देहरादून देश की एकमात्र प्रयोगशाला है जो संपदा के स्थान पर अपशिष्ट का प्रयोग कर रही है। उन्होंने कहा कि यह अगली पीढ़ी के लिए काम करने वाला संस्थान है। उन्होंने कहा कि अपशिष्ट से संपदा (वेस्ट टू वेल्थ) की अवधारणा अपेक्षाकृत नई है और आप इसके पथप्रदर्शक हैं। मंत्री महोदय ने वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) की प्रयोगशालाओं से सूक्ष्म लघु एवं माध्यम उद्यम (एमएसएमई) क्षेत्र और उद्योग जगत के साथ समन्वयन से काम करने का आग्रह किया ताकि निरंतर विकास के लिए व्यापक एकीकरण के हिस्से के रूप में काम किया जा सके।

वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद – भारतीय पेट्रोलियम संस्थान (सीएसआईआर – आईआईपी) देहरादून के निदेशक डॉ. अंजन रे ने कहा कि सीएसआईआर- आईआईपी के लिए दिपक्षीय कार्यक्षेत्र (मैंडेट) निर्धारित हैं : (क) भारत को अपने आयातित ईंधन के बोझ को कम करने में सहायता करना, और (ख) ऊर्जा को बढ़ाने के लिए साक्ष्य-आधारित अनुसंधान, विकास और क्षेत्र परिनियोजन की पहुंच और सामर्थ्य का उपयोग करके हमारे ऊर्जा उपयोग के डीकार्बनाइजेशन में राष्ट्र की सहायता करना।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा, “एक सप्ताह – एक प्रयोगशाला (वन वीक – वन लैब – ओडब्ल्यूओएल)“ कार्यक्रम को सीएसआईआर प्रयोगशालाओं के बीच साझेदारी को मजबूत करने का एक अवसर होना चाहिए क्योंकि प्रत्येक प्रयोगशाला के पास विशिष्ट जनादेश है और भोजन से लेकर ईंधन, औषधियों, पर्यावरण, चमड़ा, जीनोमिक्स, भूविज्ञान और एवं सामग्री जैसे कई अन्य विभिन्न क्षेत्रों में विशेषज्ञता है। इसके अलावा, ओडब्ल्यूओएल सीएसआईआर प्रयोगशालाओं को उनके काम का गहन विश्लेषण और सराहना करने और समाज की बेहतरी के लिए इसका उपयोग करने में सक्षम बनाता है।

डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा कि भारत 2070 तक शुद्ध शून्य ग्रीन हाउस गैस (जीरो जीएचजी) उत्सर्जन प्राप्त करते हुए बढ़ती जनसंख्या के लिए विश्वसनीय, सस्ती और टिकाऊ ऊर्जा सुनिश्चित करने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन इस महत्वाकांक्षी लक्ष्य पर ध्यान केंद्रित करने और ठोस ध्यान देने की आवश्यकता होगी। भारत का ऊर्जा उत्पादन जीवाश्म ईंधन (59.8 प्रतिशत ) पर निर्भर करता है, जिसमें कोयले का योगदान लगभग 51 प्रतिशत है, हालांकि नवीकरणीय ऊर्जा भी प्रभावशाली 38.5 प्रतिशत तक बढ़ गई है। इसलिए अभी भी ऊर्जा क्षेत्र को और अधिक कार्बन मुक्त (डीकार्बनाइज) करने की आवश्यकता है, जिसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा के साथ जीवाश्म ईंधन को बदलने, पुराने बिजली संयंत्रों से जीवाश्म कार्बन डाईऑक्साइड (सीओ 2) उत्सर्जन को कम करने और कार्बन पृथक्करण के माध्यम से अपरिहार्य कार्बन उत्सर्जन को हटाने की आवश्यकता होगी। यहीं पर विज्ञान और प्रौद्योगिकी को प्रमुख भूमिका निभानी है।

मंत्री महोदय ने कोविड-19 महामारी के दौरान राष्ट्र की सेवा करने में उल्लेखनीय अनुकूलनशीलता और लचीलेपन के लिए सीएसआईआर – आईआईपी के प्रयासों की सराहना करते हुए अपने सम्बोधन का समापन किया। उन्होंने सभी सीएसआईआर प्रयोगशालाओं से आग्रह किया कि वे इस “एक सप्ताह- एक प्रयोगशाला” कार्यक्रम का उपयोग निरंतर और प्रेरक प्रयासों में संलग्न होने के अवसर के रूप में करें ताकि सभी हितधारकों की भागीदारी को स्थायी रूप से विकसित किया जा सके।

एमएसएमई की बैठक और उसके साथ सीएसआईआर-आईआईपी का समग्र (पैन) सीएसआईआर सहयोग इस पहुंच को उसके सम्मानित एमएसएमई भागीदारों के प्रयासों को प्रदर्शित करेगा, जो न केवल इसकी प्रौद्योगिकियों के कार्यान्वयन में सहायक रहे हैं, बल्कि उन्हें भारत की विकास गाथा का एक अभिन्न अंग माना जाता है। यह आयोजन सीएसआईआर-आईआईपी के एमएसएमई भागीदारों के लिए उपयुक्त प्रतिक्रिया (फीडबैक) देने और अन्य प्रेरित एमएसएमई सहयोगियों के साथ भाईचारे की भावना विकसित का एक उपयुक्त अवसर होगा। सीएसआईआर-आईआईपी की मेडिकल ऑक्सीजन प्रौद्योगिकी, बायोगैस शोधन प्रौद्योगिकी, उन्नत पीएनजी बर्नर और उन्नत गुड़ भट्टी इस विचार -विमर्श के मुख्य आकर्षण होंगे।

पैन-सीएसआईआर सहयोग का यह प्रदर्शन सीएसआईआर-आईआईपी के आंतरिक – सीएसआईआर सहयोगी अनुसंधान को प्रदर्शित करने के लिए एक मंच प्रदान करेगा। सीएसआईआर-आईआईपी के वैज्ञानिकों और सीएसआईआर की अन्य प्रयोगशालाओं के उनके सहयोगियों की संयुक्त प्रस्तुतियां हाल की उन गतिविधियों और उपलब्धियों को उजागर करेंगी जो राष्ट्रीय नेतृत्व के आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना से जुड़ी हैं।

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