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भारतीय शोधकर्ताओं ने एक अत्यंत उज्जवल और हाइड्रोजन कमी के साथ तेजी से उभरने वाले सुपरनोवा का पता लगाया

भारतीय शोधकर्ताओं ने एक अत्यंत उज्जवल और हाइड्रोजन कमी के साथ तेजी से उभरने वाले सुपरनोवा का पता लगाया है जो एक अति-शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र के साथ एक अनोखे न्यूट्रॉन तारे से ऊर्जा लेकर चमकता है। ऐसी प्राचीन आकाशीय पिंडों के गहन अध्ययन से प्रारंभिक ब्रह्मांड के रहस्यों की जांच करने में मदद मिल सकती है।

इस प्रकार के सुपरनोवा को सुपरल्यूमिनस सुपरनोवा (एसएलएसएनई) कहा जाता है जो काफी दुर्लभ होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे आम तौर पर बहुत बड़े तारों (न्यूनतम द्रव्यमान की सीमा सूर्य के 25 गुना से अधिक) से उत्पन्न होते हैं और हमारी आकाशगंगा अथवा आसपास की आकाशगंगाओं में ऐसे विशाल तारों का वितरण काफी विरल है। उनमें एसएलएसएनई-1 स्पेक्ट्रोस्कोपिक तौर पर अब तक पुष्टि की गई लगभग 150 आकाशीय पिंडों में शामिल है। ये प्राचीन पिंड सबसे कम समझे जाने वाले सुपरनोवा में शामिल हैं क्योंकि उनके अंतर्निहित स्रोतों के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी नहीं है और उनकी अत्यधिक चमक को पारंपरिक एसएन पावर सोर्स मॉडल का उपयोग करके भी स्पष्ट नहीं किया जा सका है जिसमें Ni56 – Co56 – Fe56 का विघटन शामिल है।

एसएन 2020एएनके की खोज सबसे पहले 19 जनवरी 2020 को ज्विकी ट्रांजिएंट फैसिलिटी द्वारा की गई थी। फरवरी 2020 से और उसके बाद मार्च एवं अप्रैल की लॉकडाउन अवधि में इसका अध्ययन भारत सरकार के विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के अंतर्गत स्वायत्त अनुसंधान संस्थान आर्यभट्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्जर्वेशनल साइंसेज (एआरआईईएस) नैनीताल के वैज्ञानिकों द्वारा किया गया। यह सुपरनोवा उस क्षेत्र में मौजूद अन्य पिंडों के समान स्पष्ट तौर पर दिख रहा था। हालांकि उसकी चमक का अनुमान लगाया गया और वह काफी नीली वस्तु के रूप में दिखा जो उसकी अत्यंत चमक वाली प्रकृति को दर्शाता है।

टीम ने दो अन्य भारतीय दूरबीनों: संपूर्णानंद टेलीस्कोप- 1.04एम और हिमालयन चंद्र टेलीस्कोप- 2.0एम के साथ हाल ही में चालू किए गए भारत के देवस्थल ऑप्टिकल टेलीस्कोप (डीओटी- 3.6एम) में विशेष व्यवस्थाओं का उपयोग करते हुए इसका अवलोकन किया। उन्होंने पाया कि प्याज जैसी संरचना वाले सुपरनोवा की बाहरी परतों को छील दिया गया था और कोर किसी अन्य ऊर्जा स्रोत के साथ चमक रहा था। यह अध्ययन डॉ. एस. बी. पांडे के तहत काम करने वाले एक पीएचडी छात्र अमित कुमार के नेतृत्‍व में किया गया और इसे रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की मासिक पत्रिका में प्रकाशित किया गया है। इसमें कहा गया है कि ऊर्जा का स्रोत एक अति-शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटार) वाला अनोखा न्यूट्रॉन तारा हो सकता है जिसका कुल उत्सर्जित द्रव्यमान सूर्य के द्रव्‍यमान के मुकाबले 3.6 से 7.2 गुना अधिक है।

यह अध्ययन भविष्य में बहुत ही दुर्लभ एसएलएसएनई की खोज में 3.6. डीओटी की भूमिका को स्थापित करता है। गहन जांच से इसमें अंतर्निहित भौतिक ढांचे, संभावित पूर्वजों, ऐसे दुर्लभ विस्फोटों की मेजबानी करने वाले वातावरण और गामा-रे बर्स्ट (जीआरबी) एवं फास्ट रेडियो बर्स्ट (एफआरबी) जैसे अन्य ऊर्जावान विस्फोटों के साथ उनके संभावित जुड़ाव का पता लगाया जा सकता है।

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