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नागपुर में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति में मल्टी-मोड हैंड ग्रेनेड का पहला बैच भारतीय सेना को सौंपा गया

रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (डीआरडीओ) के टर्मिनल बैलिस्टिक अनुसंधान प्रयोगशाला से टेक्नोलॉजी हस्तांतरण के बाद इकोनॉमिक एक्सप्लोसिव लिमिटेड (ईईएल) द्वारा बनाया गया मल्टी-मोड हैंड ग्रेनेड (एमएमएचजी) का पहला बैच नागपुर, महाराष्ट्र में 24 अगस्त, 2021 को रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की उपस्थिति में भारतीय सेना को सौंपा गया।

ईईएल के अध्यक्ष एस एन नुवाल ने निजी क्षेत्र से हथियार की पहली डिलीवरी के मौके पर एमएमएचजी की स्केल प्रतिकृति रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को सौंपी। इस अवसर पर सेनाध्यक्ष जनरल एस एस नरवणे, रक्षा अनुसंधान और विकास विभाग के सचिव और डीआरडीओ के अध्यक्ष डॉ. जी सतीश रेड्डी, इनफैंट्री महानिदेशक ले. जनरल ए के सामंत्रा और अन्य लोग भी उपस्थित थे।

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने उपस्थित लोगों को संबोधित करते हुए सेना को एमएमएचजी सौंपे जाने को सावर्जनिक और निजी क्षेत्र के बीच बढ़ते सहयोग का आदर्श उदाहरण और रक्षा मैन्युफैक्चरिंग में आत्म-निर्भरता की दिशा में बड़ा कदम बताया। उन्होंने कहा “आज का दिन भारतीय रक्षा क्षेत्र के इतिहास में यादगार दिन है। रक्षा उत्पादन के मामले में हमारा निजी उद्योग परिपक्व हो रहा है। यह न केवल रक्षा मैन्युफैक्चरिंग के क्षेत्र में मील का पत्थर है बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के आत्म-निर्भर भारत के विजन को हासिल करने में भी मील का पत्थर है।” रक्षा मंत्री ने कोविड-19 प्रतिबंधों के बीच ऑर्डर की तेजी से डिलीवरी के लिए डीआरडीओ तथा ईईएल की सराहना की और आशा व्यक्त की कि अगली खेप की डिलीवरी तेजी से होगी।

रक्षा मंत्री ने रक्षा क्षेत्र को सशस्त्र बलों की वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को पूरा करने वाले आत्म-निर्भर उद्योग में बदलने के लिए सरकार द्वारा किए गए उपायों की जानकारी दी। इन उपायों में उत्तर प्रदेश और तमिलनाडु में डिफेंस इंडस्ट्रीयल कॉरिडोर की स्थापना, रक्षा उत्पादन और निर्यात संवर्धन नीति (डीपीईपीपी) 2020 का प्रारूप तैयार करना, घरेलू कंपनियों से खरीद के लिए 2021-22 के लिए पूंजी प्राप्ति बजट के अंतर्गत आधुनिकीकरण कोष का 64 प्रतिशत निर्धारित करना, आत्म-निर्भरता और रक्षा निर्यात को बढ़ावा देने के लिए 200 रक्षा सामग्रियों की स्वदेशीकरण की सार्थक सूचियों को अधिसूचित करना, आयुध फैक्ट्री बोर्ड (ओएफबी) का निगमीकरण, ऑटोमेटिक रूट के अंतर्गत एफडीआई की सीमा 49 से 74 प्रतिशत तथा सरकारी रूट से 74 प्रतिशत से ऊपर करना तथा पूंजी प्राप्ति के लिए बाइ इंडियन -आईडीडीएम (स्वदेश में डिजायन, विकसित और निर्मित) को शीर्ष प्राथमिकता देना शामिल है।

राजनाथ सिंह ने सरकर की एक अन्य पहल यानी डीआरडीओ द्वारा तकनीक हस्तांतरण का विशेष उल्लेख किया। इन उपायों को रक्षा उद्योग की रीढ़ बताते हुए उन्होंने इनक्यूबेटर होने के लिए डीआरडीओ की सराहना की जो निशुल्क टेक्नोलॉजी हस्तांतरण कर रहा है और 450 से अधिक पेटेंटों को परीक्षण सुविधाओं की पहुंच प्रदान कर रहा है। इससे उद्योग न केवल उपयोग के लिए तैयार टेक्नोलॉजी में सक्षम बना है बल्कि समय,ऊर्जा और धन की बचत की है।

रक्षा मंत्री ने रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवाचार(आईडेक्स) के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इसका लक्ष्य आत्म-निर्भरता की प्राप्ति और एमएसएमई, स्टार्ट-अप,व्यक्तिगत अन्वेषकों , अनुसंधान और विकास संस्थानों तथा एकेडेमी को शामिल करके रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्रों में नवाचार तथा टेक्नोलॉजी विकास को बढ़ावा देना है। इस पहल के अंतर्गत सशस्त्र बलों, सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा प्रतिष्ठानों तथा ओएफबी की कठिनाइयों को चिन्हित किया गया है और समाधान के लिए डिफेंस इंडिया स्टार्ट-अप चैलेंज((डीआईएससी) के माध्यम से उद्यमियों, एमएसएमई, स्टार्ट-अप तथा अन्वेषकों के समक्ष लाया गया है।

राजनाथ सिंह ने सरकर की एक अन्य पहल यानी डीआरडीओ द्वारा तकनीक हस्तांतरण का विशेष उल्लेख किया। इन उपायों को रक्षा उद्योग की रीढ़ बताते हुए उन्होंने इनक्यूबेटर होने के लिए डीआरडीओ की सराहना की जो निशुल्क टेक्नोलॉजी हस्तांतरण कर रहा है और 450 से अधिक पेटेंटों को परीक्षण सुविधाओं की पहुंच प्रदान कर रहा है। इससे उद्योग न केवल उपयोग के लिए तैयार टेक्नोलॉजी में सक्षम बना है बल्कि समय,ऊर्जा और धन की बचत की है।

रक्षा मंत्री ने रक्षा उत्कृष्टता के लिए नवाचार(आईडेक्स) के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इसका लक्ष्य आत्म-निर्भरता की प्राप्ति और एमएसएमई, स्टार्ट-अप, व्यक्तिगत अन्वेषकों, अनुसंधान और विकास संस्थानों तथा एकेडेमी को शामिल करके रक्षा और एयरोस्पेस क्षेत्रों में नवाचार तथा टेक्नोलॉजी विकास को बढ़ावा देना है। इस पहल के अंतर्गत सशस्त्र बलों, सार्वजनिक क्षेत्र के रक्षा प्रतिष्ठानों तथा ओएफबी की कठिनाइयों को चिन्हित किया गया है और समाधान के लिए डिफेंस इंडिया स्टार्ट-अप चैलेंज (डीआईएससी) के माध्यम से उद्यमियों, एमएसएमई, स्टार्ट-अप तथा अन्वेषकों के समक्ष लाया गया है।

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