राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन (एनएमसीजी) की कार्यकारिणी समिति की 46वीं बैठक 23 दिसंबर 2022 को एनएमसीजी के महानिदेशक जी अशोक कुमार की अध्यक्षता में संपन्न हुई। इस बैठक में जिन परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई, उनमें से 2700 करोड़ रुपये से अधिक मूल्य की 12 परियोजनाएं उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल में सीवरेज के बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित हैं। उत्तराखंड और बिहार के लिए वर्ष 2022-23 के लिए 42.80 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से वनरोपण कार्यक्रम को भी मंजूरी दी गई। इस कार्यक्रम का उद्देश्य सामुदायिक भागीदारी के दृष्टिकोण के साथ जलवायु के प्रति लचीले और टिकाऊ पारिस्थितिकी तंत्र के प्रबंधन के लिए एक सक्षम वातावरण का निर्माण करना है।
एनएमसीजी के महानिदेशक ने एनएमसीजी की कार्यकारिणी समिति की 46वीं बैठक की अध्यक्षता की
गंगा की सहायक नदियों पर विशेष ध्यान देते हुए लगभग 2700 करोड़ रुपये मूल्य की परियोजनाएं स्वीकृत
उत्तर प्रदेश में 3 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिनमें से 475.19 करोड़ रुपये की लागत वाली एक परियोजना प्रयागराज में सीवरेज के बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित है ।
बिहार में दाउदनगर और मोतिहारी कस्बों के लिए क्रमशः 42.25 और 149.15 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से एक-एक परियोजना को मंजूरी दी गई
पश्चिम बंगाल में आदि गंगा नदी के संरक्षण के लिए 653.67 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से एक बड़ी परियोजना को मंजूरी दी गई।
उत्तराखंड और बिहार के लिए वर्ष 2022-23 हेतु वनरोपण कार्यक्रम को भी मंजूरी दी गई
पांचों राज्यों के लिए ‘गंगा नदी के तटों के निकट उनके संरक्षण और क्षेत्र के आर्थिक विकास के साथ-साथ लोकवानस्पतिक उद्देश्यों के लिए कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से पुष्प विविधता का वैज्ञानिक अन्वेषण‘ नामक परियोजना को भी मंजूरी दी गई
पश्चिम बंगाल के कोलकाता में गंगा की सहायक नदी आदि गंगा के संरक्षण के लिए 653.67 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से एक बड़ी परियोजना को मंजूरी दी गई। इसमें 10 मिलियन लीटर प्रति दिन (एमएलडी), 11.60 एमएलडी और 3.5 एमएलडी की क्षमता वाले 3 सीवेज ट्रीटमेंट संयंत्रों (एसटीपी) का निर्माण शामिल है।
उत्तर प्रदेश में कुल 3 परियोजनाओं को मंजूरी दी गई, जिनमें से 475.19 करोड़ रुपये की लागत वाली एक परियोजना प्रयागराज में सीवरेज के बुनियादी ढांचे के विकास से संबंधित है । प्रयागराज परियोजना में 20 केएलडी की क्षमता वाली मल कीचड़ सह-उपचार सुविधा और 90 एमएलडी की क्षमता वाले अपशिष्ट स्टेशन, अवरोधन और डायवर्जन कार्य आदि के साथ-साथ 90 एमएलडी की क्षमता वाले एसटीपी के निर्माण की परिकल्पना की गई है। उत्तर प्रदेश में स्वीकृत दो अन्य परियोजनाओं में गोमती नदी के लिए लोनियापुरवा, लखनऊ में 264.67 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से 50 एमएलडी एसटीपी का निर्माण,आईएंडडी कार्य आदि तथा सेंगर और कारवां नदियों के लिए हाथरस शहर में 128.91 करोड़ रुपये की लागत से 24 एमएलडी एसटीपी, आई एंड डी कार्य आदि शामिल हैं।
बिहार में दाउदनगर और मोतिहारी कस्बों के लिए क्रमशः 42.25 और 149.15 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से एक-एक परियोजना को मंजूरी दी गई। दाउदनगर के लिए आईएंडडी कार्यों के साथ-साथ 10.50 एमएलडी एसटीपी का निर्माण और मोतिहारी के लिए, 4.6, 6.3, 5.8, 6.3 एमएलडी की क्षमता वाले और आईएंडडी कार्यों आदि के लिए 4 एसटीपी की परिकल्पना की गई है। बिहार में 4 परियोजनाओं की लागत में वृद्धि को भी मंजूरी दी गई।
कार्यकारिणी समिति की 46वीं बैठक में झारखंड के लिए एक बड़ी परियोजना को मंजूरी दी गई। इस परियोजना में धनबाद शहर में 808.33 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से कुल 192 एमएलडी क्षमता (18+21+75+60+18) के 5 एसटीपी का निर्माण, इंटरसेप्शन और डायवर्जन तथा अन्य कार्य किया जाना शामिल हैं। यह परियोजना गंगा की एक महत्वपूर्ण सहायक नदी दामोदर नदी में प्रदूषण कम करने से संबंधित है और इसका उद्देश्य कस्बे से दामोदर में गिरने वाले सभी नालों को ट्रैप करना है जो अप्रत्यक्ष रूप से गंगा को प्रदूषित करते हैं। इस परियोजना को स्वीकृति दिए जाने के साथ ही झारखंड में दामोदर नदी में प्रदूषण कम करने के लिए आवश्यक सभी परियोजनाओं को मंजूरी दे दी गई है।
बैठक में पांचों राज्यों के लिए ‘गंगा नदी के तटों के निकट उनके संरक्षण और क्षेत्र के आर्थिक विकास के साथ-साथ लोकवानस्पतिक उद्देश्यों के लिए कौशल विकास कार्यक्रमों के माध्यम से पुष्प विविधता का वैज्ञानिक अन्वेषण’ नामक परियोजना को भी मंजूरी दी गई। यह परियोजना पतंजलि अनुसंधान संस्थान (पीआरआई) और पतंजलि जैविक अनुसंधान संस्थान (पीओआरआई), हरिद्वार, उत्तराखंड के सहयोग से कार्यान्वित की जाएगी। इन परियोजनाओं में पादप जैवविविधता अन्वेषण: पुष्प विविधता, लोकवानस्पतिक, औषधीय पहलू और व्यावसायिक मूल्यांकन हेतु उनकी फाइटोकेमिकल प्रोफाइलिंग, प्रशिक्षण और कौशल विकास : किसान, पारंपरिक चिकित्सकों आदि जैसे हितधारकों का तथा उन्नत वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रयोग: मिट्टी और पानी की गुणवत्ता; पुष्प फाइटोकेमिकल पर उनका प्रभाव; मृदा सूक्ष्म जीव परस्पर क्रिया और इसका प्रभाव, औषधीय पौधों की किस्में और औषधीय गुणों की खोज आदि सहित तीन घटक हैं।
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