केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव सुधांश पंत ने एक राष्ट्रीय सम्मेलन में “मानव-वन्यजीव इंटरफेस पर संवर्धित पशु जनित रोग निगरानी” विषय पर मुख्य भाषण दिया और हितधारकों के लिए “सर्पदंश के जहर की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना” को प्रतिपादित करते हुए कहा कि पशु जनित रोग चिंता का कारण हैं जो मनुष्यों के साथ-साथ पशुओं के स्वास्थ्य को भी प्रभावित कर रहे हैं। पिछले तीन दशकों में लोगों को प्रभावित करने वाली नई उभरती संक्रामक बीमारियों में से 75 प्रतिशत पशु जनित हैं।
पशु जनित रोगों की पहचान करने के सीमित ज्ञान और कौशल के साथ-साथ सभी स्तरों पर नैदानिक सुविधाओं की सीमाओं के कारण पशुओं में पाए जाने वाले रोगाणुओं से फैलने वाली बीमारियों की उपेक्षा हुई है।
यह राष्ट्रीय सम्मेलन नेशनल सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल (एनसीडीसी) के सेंटर फॉर वन हेल्थ द्वारा आज यहां हितधारकों के लिए आयोजित किया गया। इस सम्मेलन में डॉक्टर पंत के अलावा स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक डॉ. अतुल गोयल, जनजातीय कार्य मंत्रालय की अतिरिक्त. सचिव आर जया, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के सहायक महानिदेशक (पशु स्वास्थ्य) डॉ. अशोक कुमार; पशुपालन, मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय के आयुक्त (पशु स्वास्थ्य) डॉ. अभिजीत मित्रा, विश्व स्वास्थ्य संगठन की भारत में उप प्रतिनिधि डॉ. पेडेन; एनसीडीसी के सीओएच, की प्रमुख और संयुक्त निदेशक डॉ. सिम्मी तिवारी, और एनसीडीसी के सीओएच के उप निदेशक डॉ अजीत शेवाले भी शामिल हुए।
सभा को संबोधित करते हुए, सुधांश पंत ने कहा कि भविष्य में रोग के प्रकोप की तैयारी के लिए महत्वपूर्ण है कि पशु जनित रोग के विशिष्ट कारकों और तंत्र की बेहतर समझ विकसित की जाए। हाल की कोविड-19 महामारी के प्रभाव का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि “मानव और पशु दोनों दृष्टिकोण से बीमारियों का निदान ढूंढना बहुत जरूरी है क्योंकि ज्यादातर उभरती संक्रामक बीमारियाँ मानव-पशु इंटरफेस और उनके साझा वातावरण में बदलाव का परिणाम हैं। इस अंतर्संबंध को समझते हुए ‘एक स्वास्थ्य दृष्टिकोण’ के महत्व को समझना जरूरी है, जिससे प्रत्येक क्षेत्र में निहित पूरकता और सुदृढ़ता का लाभ उठाया जा सकता है और जिसकी मदद से एक एकीकृत, मजबूत और चुस्त प्रतिक्रिया प्रणाली तैयार की जा सकती है।
केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने कहा कि पशु जनित रोगों के उद्भव के अलावा, एंटी-माइक्रोबियल प्रतिरोध (एएमआर) भी विश्व स्तर पर एक महत्वपूर्ण खतरे के रूप में उभरा है। उन्होंने कहा कि “मल्टी-ड्रग प्रतिरोधी बैक्टीरिया का तेजी से प्रसार और कार्बापेनेम्स जैसे नए और अधिक शक्तिशाली रोगाणुरोधी एजेंटों के कारण होने वाले संक्रमण के इलाज के लिए नई एंटीबायोटिक दवाओं की कमी मानव स्वास्थ्य के लिए तेजी से बढ़ रहा खतरा है, जिस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है।” उन्होंने कहा, “इसी तरह, खाद्य जनित बीमारियाँ जो खराब स्वच्छता, कार्बापेनेम्स जैसे नए तथा अधिक प्रभावी एंटीमाइक्रोबियल एजेंट्स से निपटने के लिए जरूरी रोगाणुरोधी दवाओं की अनुपलब्धता, पर्यावरण प्रदूषण और फॉर्मो पर पशुपालन संबंधी गड़बडि़यां जिसमें एंटीबायोटिक दवाओं का गलत उपयोग शामिल हैं, के कारण पैदा होती हैं, वह भी काफी बड़े खतरे है, जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए।’’
इन नए और उभरते स्वास्थ्य खतरों के संदर्भ में, केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव ने ‘एक स्वास्थ्य’ दृष्टिकोण के महत्व पर जोर दिया। माननीय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत के जी20 अध्यक्षता थीम में जिस ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ की बात की है, उसमें भी एक स्वास्थ्य के दृष्टिकोण के महत्व को दोहराया गया है।
भारत सरकार द्वारा किए गए विभिन्न “एक स्वास्थ्य” संबंधी प्रयासों पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि एनसीडीसी, आईडीएसपी, एएमआर, जलवायु परिवर्तन और सेंटर फॉर वन हेल्थ जैसे अपने विभिन्न तकनीकी प्रभागों के माध्यम से महामारी से निपटने की तैयारी से संबंधित गतिविधियों को अंजाम दे रही है। यह महामारी मानव, पशु और पर्यावरण इंटरफेस पर पशु जनित रोगों के खतरे से उत्पन्न हो सकती है। स्वास्थ्य सचिव ने कहा कि केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय पहले से ही एनसीडीसी के माध्यम से विभिन्न राष्ट्रीय कार्यक्रमों को लागू कर रहा है जिसमें पशु जनित रोगों से निपटने के लिए राष्ट्रीय एक स्वास्थ्य कार्यक्रम (एनओएचपीपीसीजेड), राष्ट्रीय रेबीज़ नियंत्रण कार्यक्रम (एनआरसीपी), लेप्टोस्पायरोसिस की रोकथाम और नियंत्रण के लिए कार्यक्रम (पीपीसीएल), सांप के काटने के नियंत्रण और रोकथाम का कार्यक्रम (एसबीपीसी), एएमआर रोकथाम पर राष्ट्रीय कार्यक्रम, जलवायु परिवर्तन और मानव स्वास्थ्य पर राष्ट्रीय कार्यक्रम (एनपीसीएचएच) शामिल हैं। पशु जनित रोगों के लिए, आईसीएमआर और आईसीएआर आपसी सहयोग से संयुक्त अनुसंधान प्राथमिकताओं पर काम कर रहे हैं। विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने स्वास्थ्य, कृषि और पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालयों के साथ भारत के लिए एक स्वास्थ्य रोडमैप बनाने का प्रस्ताव दिया है और एफएसएसएआई ने लोगों की खाने की आदतों के बारे में सामुदायिक जागरूकता पैदा करने के लिए स्वस्थ भारत पहल के तहत कई पहलें की हैं। एनडीएमए और स्वास्थ्य मंत्रालय जलवायु परिवर्तन से संबंधित घटनाओं पर कार्य योजना तैयार करने और उन्हें लागू करने की दिशा में काम कर रहे हैं। भारत आईसीएमआर के तहत वन हेल्थ रिसर्च पर ध्यान केंद्रित करने के लिए नागपुर में वन हेल्थ सेंटर ऑफ एक्सीलेंस भी स्थापित कर रहा है।
सुधांश पंत ने यह भी कहा कि सर्पदंश से शरीर में फैलने वाले जहर से जीवन के लिए खतरा पैदा होता है और यह जन स्वास्थ्य चिंता का महत्वपूर्ण विषय है क्योंकि भारत में यह बहुतायत में होता है। उन्होंने कहा कि “राष्ट्रीय स्तर पर सर्पदंश के मुद्दों और चुनौतियों से निपटने के लिए एक समर्पित ढांचा होना महत्वपूर्ण है।”
कार्यक्रम के दौरान, गणमान्य व्यक्तियों ने “सर्पदंश के जहर की रोकथाम और नियंत्रण के लिए राष्ट्रीय कार्य योजना” पर अंतर-मंत्रालयी ‘एक स्वास्थ्य सहायता वक्तव्य’ का समर्थन किया। इस अवसर पर रेबीज हेल्पलाइन पर तकनीकी दस्तावेज, भारत में चिकित्सकीय रूप से महत्वपूर्ण सांपों की जानकारी और पशु जनित रोगों की रोकथाम, तैयारी और प्रतिक्रिया की भी शुरूआत की गई।
‘एक स्वास्थ्य’ दृष्टिकोण के महत्व पर जोर देते हुए डॉ. अतुल गोयल ने कहा कि पशु जनित रोगों की इस अवधारणा में न केवल पशु बल्कि पौधे भी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि पशुजनित रोगों का एक बहुत बड़ा कारण प्रकृति में मानव का बढ़ता अतिक्रमण है।
डॉ. अशोक कुमार ने इस बात पर जोर दिया कि ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण के तहत बीमारियों का शीघ्र पता लगाना आवश्यक है ताकि पशुओं से मनुष्यों या इसके विपरीत फैलने वाले रोगाणुओं का प्रभावी निदान किया जा सके। उन्होंने कहा कि आईसीएआर अनुसंधान के विषय पर अंतर-मंत्रालयी स्तर पर विभिन्न संस्थानों के साथ काम कर रहा है
आर. जया ने कहा कि ‘वन हेल्थ’ दृष्टिकोण स्वाभाविक रूप से वसुधैव कुटुंबकम के दर्शन से उत्पन्न है। उन्होंने कहा कि ‘वन हेल्थ’ रूपरेखा का समर्थन करने के लिए जनजातीय कार्य मंत्रालय सामुदायिक गतिशीलता और जागरूकता फैलाने जैसे महत्वपूर्ण कदम उठाएगा।
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