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केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री डॉ. भारती प्रवीण पवार ने ”संस्थानों की सीमाओं से परे मानसिक स्वास्थ्य” विषय पर राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री डॉ. भारती प्रवीण पवार ने आज यहां ”संस्थानों की सीमाओं से परे मानसिक स्वास्थ्य”विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस अवसर पर एनएचआरसी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा भी उपस्थित थे। सम्मेलन का उद्देश्य मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के कार्यान्वयन में चुनौतियों पर चर्चा करना और मानसिक स्वास्थ्य मुद्दों के समाधान पर आगे बढ़ने के तरीके पर विचार-विमर्श करना है।

डॉ. पवार ने कहा कि “मानसिक स्वास्थ्य हमारे स्वास्थ्य का एक अभिन्न अंग है क्योंकि यह हमारे जीवन के सभी पहलुओं को प्रभावित करता है।” मानसिक स्वास्थ्य के महत्व को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा कि “इस लांछन को दूर करना अत्यंत महत्वपूर्ण है जो जरूरतमंदों को आवश्यक सहायता प्राप्त करने से रोकता है ।” उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मानसिक स्वास्थ्य को बहुत महत्व दिया गया है,जो ऐतिहासिक मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के पारित होने से प्रदर्शित होता है।

मानसिक स्वास्थ्य की चुनौतियों के समाधान और मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के महत्व को रेखांकित करते हुए डॉ. पवार ने कहा कि “केंद्र सरकार सामान्य मानसिक विकारों के किफायती उपचार की उपलब्धता और पहुंच को बढ़ावा दे रही है “। उन्होंने बताया कि मानसिक स्वास्थ्य को केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण आयुष्मान भारत योजना में शामिल किया गया है। उन्होंने यह भी कहा कि “राष्ट्रीय दूर-मानसिक स्वास्थ्य सेवा के लॉन्च के बाद से, 42 टेली-मानस सेल स्थापित किए गए हैं जो पहले ही 2 लाख से अधिक कॉल रिकॉर्ड कर चुके हैं”।

केंद्रीय मंत्री ने एक नए मानसिक स्वास्थ्य देखभाल प्रतिमान की आवश्यकता रेखांकित की जो संस्थानों की सीमाओं से परे हो और समुदाय-आधारित सहायता पर ध्यान केंद्रित करती हो। उन्होंने गणमान्य व्यक्तियों से भारत में मानसिक स्वास्थ्य चुनौतियों के गंभीर मुद्दे पर विचार-विमर्श करने और ऐसे भविष्य की दिशा में काम करने का आग्रह किया जहां मानसिक स्वास्थ्य देखभाल सुलभ, किफायती, समावेशी और सहानुभूतिपूर्ण हो।

न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने कहा कि 10 में से एक व्यक्ति एक या विभिन्न प्रकार के मानसिक विकारों से पीड़ित है। उन्होंने कहा कि, ” मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देने के लिए स्वास्थ्य देखभाल, शिक्षा, सार्वजनिक नीति और सामाजिक सहायता प्रणालियों से जुडे एक व्यापक दृष्टिकोण की आवश्यकता हैं।”

मानसिक बीमारी के प्रति संवेदना नहीं, बल्कि सहानुभूति की आवश्यकता पर बल देते हुए उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य के समान ही महत्व दिए जाने का मजबूती से समर्थन किया। उन्होंने कहा, “हमें मानसिक स्वास्थ्य, मादक द्रव्यों के सेवन, सामान्य चिकित्सा देखभाल और अस्पताल तथा सामुदायिक देखभाल के एकीकरण की आवश्यकता है, जो भली-भांति समन्वित नहीं हैं”। न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने कहा कि “मानसिक स्वास्थ्य के बिना, कोई स्वास्थ्य नहीं है”। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए प्रयास करने की आवश्यकता रेखांकित की। उन्होंने कहा, ”हमें अनिवार्य रूप से मानसिक स्वास्थ्य शिक्षा को अपने स्कूलों, कॉलेजों और कार्यस्थलों में समेकित करना चाहिए। सोशल मीडिया के साथ भी स्वस्थ सीमाएँ निर्धारित करना आवश्यक है।”

भारत में मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों पर ध्यान देने की चुनौतियों को रेखांकित करते हुए, न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा ने मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं और अनुसंधान को अद्यतन करने के लिए अधिक धन और संसाधन आवंटित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने मानसिक स्वास्थ्य संस्थानों में मनोरंजन की सुविधाओं जैसे उचित बुनियादी ढांचे की आवश्यकता पर भी जोर दिया और पेशेवर मानसिक स्वास्थ्य पाठ्यक्रमों के लिए शैक्षणिक संस्थानों और सीटों की संख्या बढ़ाने पर बल दिया।

कार्यक्रम के दौरान, गणमान्य व्यक्तियों द्वारा ‘मानसिक स्वास्थ्य: सभी के लिए चिंता – मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के संदर्भ में’ नामक पुस्तक और ‘मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के कार्यान्वयन की स्थिति’ पर एक रिपोर्ट भी जारी की गई।

राष्ट्रीय सम्मेलन में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 के कार्यान्वयन में चुनौतियों पर विषयगत सत्र होंगे जिनमें, मानसिक स्वास्थ्य प्रतिष्ठानों के ढांचागत पहलू और मानव संसाधन; मानसिक रोग से पीड़ित व्यक्तियों के अधिकार, जिनमें पुनर्एकीकरण, पुनर्वास और सशक्तिकरण; और मानसिक स्वास्थ्य की गंभीर देखभाल में नवीनतम रुझान, अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य और भविष्य का रास्ता शामिल हैं।

इस अवसर पर एनएचआरसी के महासचिव भरत लाल; एनएचआरसी के सदस्य राजीव जैन; एनएचआरसी के सदस्य डॉ डी एम मुले; एनएचआरसी के पूर्व सदस्य न्यायमूर्ति एम एम कुमार; एनएचआरसी के संयुक्त सचिव डी के निम; गैर सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय तथा एनएचआरसी के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

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