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केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने संथा कवि भीमा भोई और महिमा पंथ की विरासत पर दो दिवसीय अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी का उद्घाटन किया

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आज ओडिशा के भुवनेश्वर में दो दिवसीय ‘संथा कवि भीमा भोई और महिमा पंथ की विरासत पर अंतर्राष्ट्रीय संगोष्ठी’ का उद्घाटन किया। इस कार्यक्रम में कई शिक्षाविद्, गणमान्य व्यक्ति, विश्वविद्यालयों के कुलपति, प्रख्यात वक्ता आदि उपस्थित थे। कार्यक्रम के दौरान संथा कवि भीमा भोई और महिमा पंथ की विरासत पर एक लघु वीडियो का प्रदर्शन भी किया गया।

ओडिशा केंद्रीय विश्वविद्यालय, गुरु घासीदास विश्वविद्यालय, आंध्र प्रदेश केंद्रीय जनजातीय विश्वविद्यालय, एसओए मानद विश्वविद्यालय भुवनेश्वर और शास्त्रीय उड़िया अध्ययन उत्कृष्टता केंद्र, सीआईआईएल, इस संगोष्ठी को आयोजित करने के लिए शिक्षा मंत्रालय का सहयोग कर रहे हैं।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस अवसर पर अपने संबोधन में इस बात पर प्रकाश डाला कि कैसे संथा बलराम दास के लक्ष्मी पुराण और संथा कबी भीमा भोई के दर्शन और कविताओं ने समाज में सबसे कमजोर लोगों की समस्याओं का समाधान किया। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि दोनों ने उड़िया समाज की सांस्कृतिक और साहित्यिक चेतना को फिर से जागृत करने में अग्रणी भूमिका निभाई थी।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री महोदय ने उल्लेख किया कि महिमा धर्म और इसका दर्शन सदैव उनके लिए जीवन में प्रेरणा का स्रोत रहेगा और उन्हें इस कार्यक्रम में उपस्थित अत्यधिक सम्मानित संतों और ओडिशा, झारखंड, छत्तीसगढ़, आंध्र प्रदेश और पश्चिम बंगाल के शिक्षाविदों और विद्वानों को संबोधित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। धर्मेंद्र प्रधान ने कहा कि भीमा भोई का दर्शन अब पहले से कहीं और अधिक प्रासंगिक है और मानवता के कल्याण को स्वयं के कल्याण से ऊपर रखने के लिए समाज के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत है।

भारत के ओडिशा के आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में सम्मिलित महिमा पंथ, सादगी, समानता और निराकार ईश्वर के प्रति समर्पण पर ध्यान देने के साथ एक विशिष्ट धार्मिक आंदोलन का प्रतिनिधित्व करता है। महिमा पंथ के केंद्र में महिमा गोसेन और उनके शिष्य, भीमा भोई जैसे दो दिग्गज हैं, जो 19वीं शताब्दी के अंत में आए थे। उन्होंने महिमा आंदोलन के माध्यम से अपने आध्यात्मिक नेतृत्व और सामाजिक क्रांति के साथ समकालीन ओडिया समाज में एक अमिट छाप छोड़ी, जो आज भी क्षेत्र के सांस्कृतिक और सामाजिक ताने-बाने में गूंजता है। भीमा भोई को आम तौर पर “संथा कवि” अर्थात “संत कवि” कहा जाता है। उनकी आध्यात्मिक शिक्षाओं और उड़िया भजन तथा चौतिसा (भक्ति गीत) के रूप में साहित्यिक योगदान के लिए पूर्वी भारत में वे हर जगह श्रद्धेय हैं। प्रसिद्ध “स्तुति चनितामणि” गहन भक्ति, आध्यात्मिक और दार्शनिक अंतर्दृष्टि के साथ ओडिया भाषा में कई छंदों से युक्त बेहतरीन पुस्तक है।

संगोष्ठी का उद्देश्य महिमा गोसेन, संथा कवि भीमा भोई और बिस्वनाथ बाबा के जीवन और कार्यों तथा आध्यात्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक पहलुओं पर महिमा पंथ के गहरे प्रभाव पर प्रकाश डालना है। संगोष्ठी के उप-विषय निम्नलिखित हैं: महिमा गोसेन और संथा कवि भीमा भोई – संतों के जीवन और कार्य; सर्वधर्म समन्वय – महिमा पंथ की उत्पत्ति और विश्वास; सामाजिक समरसता – महिमा पंथ के माध्यम से सामाजिक सुधार और समानता; जनजागरण – जनजातीय समुदायों पर महिमा प्रभाव; अध्यात्म समाज – आध्यात्मिकता और सामाजिक परिवर्तन की परस्पर क्रिया; कला और संस्कृति -महिमा परंपरा के भीतर कलात्मक और सांस्कृतिक अभिव्यक्तियों की खोज; उड़िया साहित्य और भीमा भोई – साहित्यिक विरासत; आधुनिकता -महिमा दर्शन और शिक्षाओं की समकालीन प्रासंगिकता; सांस्कृतिक संरक्षण: महिमा पंथ की सांस्कृतिक विरासत का संरक्षण और प्रचार; और संथा परंपरा और भीमा भोई – संथा परंपरा और भीमा भोई।

इससे पहले दिन में, धर्मेंद्र प्रधान ने केंद्रीय युवा कार्यक्रम एवं खेल मंत्रालय और नेहरू युवा केंद्र संगठन द्वारा भुवनेश्वर में आयोजित राज्य स्तरीय युवा महोत्सव में भाग लिया। कार्यक्रम का उद्देश्य युवाओं को प्रेरित करना और उनके बीच सांस्कृतिक विविधता को प्रोत्साहन प्रदान करना है।

धर्मेंद्र प्रधान ने विकसित भारत के निर्माण में युवाओं को एकजुट करने के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण के अनुरूप कार्यक्रम आयोजित करने के लिए आयोजकों को धन्यवाद दिया। उन्होंने मोबाइल फोटोग्राफी जैसी नई प्रतियोगिताएं जोड़ने के लिए भी उन्हें बधाई दी। उन्होंने यह भी बताया कि युवाओं का उत्साह, साहस और रचनात्मकता किस प्रकार समाज को प्रेरित करती है और दिशा प्रदान करती है। केंद्रीय मंत्री महोदय ने यह भी उल्लेख किया कि सम्मान और स्वाभिमान के साथ आत्मनिर्भरता ही आज युवाओं की आवश्यकता है।

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