केंद्रीय सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्री नितिन गडकरी ने वैकल्पिक ईंधन को अपनाने पर जोर दिया है जो आयात का विकल्प, किफायती, प्रदूषण मुक्त और स्वदेशी होगा और ईंधन के रूप में पेट्रोल या डीजल के उपयोग को हतोत्साहित करेगा। ‘भारतीय चीनी मिल संघ (इस्मा)’ द्वारा ‘वैकल्पिक ईंधन-आगे की राह’ विषय पर आयोजित सम्मेलन को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि वैकल्पिक ईंधन के रूप में जैव-इथेनॉल का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह बहुत कम ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के साथ एक स्वच्छ ईंधन है। उन्होंने कहा कि जो अतिरिक्त आय उत्पन्न होती है वह सीधे किसानों को दी जाती है, जो ग्रामीण और पिछड़ी अर्थव्यवस्था को सशक्त बनाती है।
नितिन गडकरी ने कहा कि इथेनॉल उत्पादन क्षमता और ईंधन के रूप में इसकी उपयोगिता को देखते हुए, सरकार ने ई-20 ईंधन कार्यक्रम को फिर से डिजाइन और लॉन्च किया है, जो भारत में 2025 तक पेट्रोल के साथ 20 प्रतिशत मिश्रण में बायो-इथेनॉल का उपयोग सुनिश्चित करेगा। उन्होंने कहा कि सरकार ने यह भी गणना की है कि 20 प्रतिशत इथेनॉल मिश्रण प्राप्त करने के लिए, देश को 2025 तक लगभग 10 अरब लीटर इथेनॉल की आवश्यकता होगी। उन्होंने कहा कि वर्तमान में, चीनी उद्योग देश में मिश्रित ईंधन के रूप में इथेनॉल की मांग में 90 प्रतिशत का योगदान देता है।
नितिन गडकरी ने कहा कि वह उपलब्ध संसाधनों के साथ इथेनॉल उत्पादन बढ़ाने के तरीके खोजने के लिए शोध करते रहते हैं और ऐसा ही एक प्रस्ताव बी-हैवी (भारी) शीरे में 15 प्रतिशत से 20 प्रतिशत चीनी मिलाने का है। उन्होंने कहा कि इससे कई लाभ होंगे क्योंकि यह लगभग 45 से 60 लाख मीट्रिक टन चीनी के अतिरिक्त भंडार का उपयोग करेगा और कच्चे माल की बेहतर गुणवत्ता के कारण इथेनॉल के उत्त्पादन में 30 प्रतिशत तक सुधार करेगा।
इसी तरह, मंत्री ने कहा कि चीनी से सी-हैवी शीरे के उत्पादन को हतोत्साहित किया जा सकता है जो बी-हैवी शीरे के उत्पादन को मानकीकृत करेगा और स्थायी रूप से चीनी के उत्पादन में 1.5 प्रतिशत प्रति मीट्रिक टन गन्ने की खपत को कम करेगा।
नितिन गडकरी ने कहा कि इन सभी कदमों से इथेनॉल का उत्पादन बढ़ेगा और एक ऐसा परिदृश्य बन सकता है जहां एक राज्य में अतिरिक्त उपलब्ध इथेनॉल को पूर्वोत्तर और जम्मू-कश्मीर और लद्दाख जैसे इथेनॉल की कमी वाले राज्यों में भेजा जा सकता है। उन्होंने कहा कि जैव-इथेनॉल उड्डयन उद्देश्य के लिए एक स्थायी ईंधन भी हो सकता है। क्योंकि यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 80 प्रतिशत की कमी ला सकता है और बिना किसी संशोधन के इसे पारंपरिक विमान ईंधन के साथ 50 प्रतिशत तक मिश्रित किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि भारतीय वायु सेना द्वारा इसका परीक्षण और अनुमोदन पहले ही किया जा चुका है। उन्होंने कहा कि 100 प्रतिशत जैव-इथेनॉल पर आधारित फ्लेक्स-ईंधन वाहनों के प्रयोग से इथेनॉल की मांग तुरंत चार से पांच गुना बढ़ जाएगी।
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