मार्च 9-11 के दौरान भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान द्वारा आयोजित कृषि विज्ञान मेला, जिसकी प्रमुख थीम “तकनीकी ज्ञान से आत्म-निर्भर किसान”थी, का आज समापन हुआ। समापन समारोह में देशभर के कोने-कोने से आए 36 चयनित किसानों को भाकृअनु संस्थान-नवोन्मेषी किसान 2022 पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
मेले मेंसंपूर्ण देश के अलग-अलग क्षेत्रों से आए लगभग 40000 किसानों ने भाग लिया, और भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान एवं भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के 100 से अधिक संस्थानों, कृषि विज्ञान केन्द्रों की उन्नत किस्मों एवं नवोन्मेषी तकनीकों से लाभान्वित हुए। इस मेले में भारतीय अनुसंधान संस्थान ने ड्रोन तकनीकी, परिशुद्ध खेती, गेहूँ, फल, सब्जी, फूल, विभिन्न कृषि प्रौद्योगिकियों के मॉडल एवं कृषि परामर्श सेवाओं का सजीव प्रदर्शन लगाया गया। इस मेले के प्रमुख आकर्षण स्मार्ट/डिजिटल कृषि, एग्री स्टार्टअप एवं किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ), पूसा संस्थान की नवीनतम प्रौद्योगिकियाँ जैसे पूसा फार्म सन फ्रिज, पूसा डीकम्पोजर, पूसा संपूर्ण जैव उर्वरक (एक अनूठा नुस्खा, जो नाइट्रोजन, फास्फोरस, पोटेशियम आदि तत्व प्रदान करने की क्षमता रखता है)। पूसा संस्थान के अपने स्टाल से 1,500 क्विंटल से अधिक बीज का विक्रय भी हुआ।
आज दो तकनीकी सत्र आयोजित किए गए। प्रथम सत्र नवोन्मेषी किसान सम्मेलन रहा, जिसकी अध्यक्षता डॉ के.वी. प्रभु, चेयरपर्सन, किसान अधिकार एवं पौधा किस्म संरक्षण प्राधिकरण ने की। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ ए.के. सिंह ने अध्यक्ष महोदय एवं सह अध्यक्ष डॉ डी.के. यादव, उप महानिदेशक (बीज) भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान का स्वागत किया और भारतीय कृषि में उनके योगदान का संक्षिप्त विवरण दिया। डॉ सिंह ने तकनीकी रूप से सशक्त किसानों के बारे में बताया, जो नई प्रौद्योगिकियों की क्षमताओं का लाभ उठा सकें। उन्होंने प्रमुख नवाचारों, जैसे किसान सारथी, जो 24×7 हैल्पलाइन है, और पूसा समाचार के बारे में बताया, जो किसानों की समस्या का समाधान करने में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं।डॉ प्रभु ने किसानों एवं वैज्ञानिकों के बीच सामंजस्य को महत्व दिया। उन्होंने उन्हें कृषि में नवाचार, आविष्कार में संघर्ष को सराहा एवं नवोन्मेषी किसानों का उत्साहवर्धन किया।उनके अनुसार, नई के माध्यम से किसानों के लिए नए-नए आयाम खुल रहे हैं। जिसके लिए भारत सरकार किसानों को संसाधनों, सुविधाओं, आर्थिक व तकनीकी सहायता प्रदान करने के लिए सदैव तत्पर रहती है। उन्होंने भविष्य में वैश्विक स्तर पर बौद्धिक संपदा का महत्व, और उसके संरक्षण में किसान अधिकार एवं पौधा किस्म संरक्षण प्राधिकरण की उपयोगिता, प्रजनकों के अधिकारों, किसानों के अधिकारों के बारे में जानकारी दी। डॉ डी.के. यादव ने भी डॉ प्रभु की बात का समर्थन किया और किसानों को अपने अधिकारों के बारे में सजग रहने की सलाह दी। उन्होंने आविष्कारों एवं स्थानीय सामग्री से जुगाड़ एवं तकनीकी ज्ञान से समृद्ध किसानों की प्रवृत्ति की सराहना की। उन्होंने पूसा संस्थान द्वारा विकसित तकनीकों का लाभ उठाकर सफलता और अधिक आय प्राप्त करने का आह्वान किया।
मेले के अंतिम तकनीकी सत्र एग्री स्टार्टअप एवं किसान उत्पादक संगठन पर आधारित था। इस सत्र की मुख्य अतिथि डॉ ए.के. सिंह, उपमहानिदेशक (कृषि विस्तार), भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद रहे। उनके साथ मंच पर डॉ एस.के. मल्होत्रा, कृषि आयुक्त, डॉ संजय गर्ग, अपर सचिव (डेयर) एवं सचिव भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद भी सम्माननीय अतिथि के रूप में उपस्थित थे। डॉ ए.के. सिंह, उपमहानिदेशक ने किसान उत्पादक संगठनों के गठन पर जोर दिया, जो कि मुख्यतः उन छोटे किसानों के लिए फायदेमंद है जो अपने उत्पादों को खुले बाजारों में ले जाने पर झिझकते हैं। उन्होंने किसानों के लिए क्लस्टर आधारित सुविधा केंद्रों के निर्माण की आवश्कता बताई, ताकि मूल्य संवर्धन एवं प्रसंस्करण को बढ़ावा दिया जा सके और माननीय प्रधानमंत्री जी के 10,000 एफ.पी.ओ. निर्माण के लक्ष्य को पूरा किया जा सके। हाल ही में प्रारंभ की गई योजना “एक जिला एक उत्पाद” का फायदा किसानों को तभी मिल पाएगा जब उन्हें उपयुक्त विपणन सहायता मिल पाएगी, और यह सभी तबके के किसानों को एफ.पी.ओ. के माध्यम से ही मिलना संभव है। एफ.पी.ओ. की सफलता तभी संभव हो पाएगी, जब सीधे वाणिज्यिक स्तर के क्रेता तक पहुँचा जाएगा। साधारण ग्राहक भी सुनिश्चित गुणवत्ता वाले खाद्य पदार्थों को खरीदने के लिए तभी तत्पर रहते हैं, जबकि जानी पहचानी एफ.पी.ओ. की व्यक्तिगत पहुँच मिल पाए। एफ.पी.ओ. को परस्पर व्यावसायिक तालमेल बिठाना चाहिए ताकि विभिन्न प्रांतों में माँग और आपूर्ति में संतुलन बनाया जाए।
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