उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने आज डेमोक्रेसी से इमोक्रेसी की ओर बदलाव पर राष्ट्रीय बहस का आह्वान किया। उन्होंने कहा, “राष्ट्रीय बहस की आवश्यकता है ताकि हम डेमोक्रेसी से इमोक्रेसी की ओर बदलाव पर ध्यान दे सकें। भावना से प्रेरित नीतियां, भावना से प्रेरित बहसें, प्रवचन सुशासन के लिए खतरा हैं। लोकलुभावनवाद ऐतिहासिक रूप से खराब अर्थशास्त्र है। कोई नेता जब लोकलुभावनवाद से एक बार जुड़ जाता है तो इस संकट से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। केंद्रीय उद्देश्य लोगों की भलाई, लोगों की सबसे बड़ी भलाई, लोगों की स्थायी भलाई होनी चाहिए। लोगों को खुद को सशक्त बनाने के योग्य बनाएं, न कि उन्हें क्षणिक रूप से सशक्त बनाएं क्योंकि इससे उनकी उत्पादकता प्रभावित होती है।”
उपराष्ट्रपति धनखड़ ने मुंबई में आज ‘नेतृत्व और शासन’ विषय पर आयोजित प्रथम ‘मुरली देवड़ा स्मृति संवाद’ में उद्घाटन भाषण देते हुए राजनीतिक क्षेत्र में तुष्टीकरण की राजनीति और सांत्वना देने की रणनीतियों के उभरने पर गहरी चिंता व्यक्त की। उन्होंने कहा, “राजनीति में एक नई रणनीति उभर रही है, और यह रणनीति तुष्टीकरण या सांत्वना देने की है। यदि चुनावी वादों पर अत्यधिक खर्च किया जाता है, तो बुनियादी ढांचे में निवेश करने की राज्य की क्षमता भी उसी अनुपात में कम हो जाती है। यह विकास यात्रा के लिए हानिकारक है। लोकतंत्र में चुनाव महत्वपूर्ण है, लेकिन इसका समापन नहीं। मैं लोकतांत्रिक मूल्यों के हित में सभी राजनीतिक दलों के नेतृत्व से इस बात पर आम सहमति बनाने का आह्वान करता हूं कि ऐसे चुनावी वादों में शामिल होना, जिन्हें राज्य के पूंजीगत व्यय की कीमत पर ही पूरा किया जा सकता है, की समीक्षा की जानी चाहिए। कुछ सरकारें जिन्होंने इस तुष्टीकरण और तुष्टीकरण तंत्र का सहारा लिया, उन्हें सत्ता में बने रहना बहुत मुश्किल हो रहा है।”
उन्होंने स्पष्ट किया कि हाशिए पर पड़े समुदायों के लिए सकारात्मक कार्रवाई तुष्टिकरण की राजनीति से अलग है। उन्होंने कहा, “मुझे गलत नहीं समझें, देवियो और सज्जनो, क्योंकि भारतीय संविधान ने जहां हमें समानता का अधिकार दिया है, वहीं यह अनुच्छेद 14, 15 और 16 में सकारात्मक शासन- सकारात्मक कार्रवाई, एससी, एसटी के लिए आरक्षण, आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिए आरक्षण की एक स्वीकार्य श्रेणी प्रदान करता है। यह पवित्र है। ग्रामीण भारत, किसान के लिए कुछ असाधारण परिस्थितियां हैं, जहां सकारात्मक कदम उठाए जाने की जरूरत है। लेकिन यह उन अन्य पहलुओं से बहुत अलग है, जिनके बारे में मैं बात कर रहा था। यह किसी को सांत्वना देने या तुष्ट करने वाली नहीं है। यह न्यायोचित आर्थिक नीति है। और इसलिए, एक अच्छा नेतृत्व ही राजनीतिक दूरदर्शिता और सक्षम नेतृत्व के मामले में राजकोषीय अर्थों में रेखा खींचने का फैसला कर सकता है।”
उपराष्ट्रपति धनखड़ ने जनसांख्यिकीय चुनौतियों और अवैध प्रवास पर प्रकाश डालते हुए कहा, “देश में लाखों अवैध प्रवासी रहते हैं, जिनसे जनसांख्यिकीय तौर पर उथल-पुथल मचता है। लाखों अवैध प्रवासी इस देश में हैं, जो हमारी स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं पर बोझ बन रहे हैं। वे हमारे लोगों को रोजगार के अवसरों से वंचित कर रहे हैं। ऐसे तत्वों ने कुछ क्षेत्रों में चुनावी प्रासंगिकता को खतरनाक रूप से बढ़ा लिया है और उनकी चुनावी प्रासंगिकता हमारे लोकतंत्र के सार को प्रभावित कर रही हैं। उभरते खतरों का मूल्यांकन ऐतिहासिक संदर्भों के जरिए किया जा सकता है, जहां इसी तरह के जनसांख्यिकीय हमलों से राष्ट्रों को उनकी जातीय पहचान मिटा दी गई थी।”
प्रलोभनों के माध्यम से बड़े पैमाने पर धर्मांतरण पर गहरी चिंता व्यक्त करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा, “कोविड से भी कहीं अधिक गंभीर यह बीमारी प्रलोभनों के माध्यम से धर्मांतरण के साथ गंभीर रूप से जुड़ी हुई है, जिसमें कमजोर वर्गों को फंसाने की कोशिश की जा रही है। हाशिए पर रहने वाले, आदिवासी और कमजोर लोग इन प्रलोभनों का आसान शिकार बन जाते हैं। आस्था आपकी अपनी है। आस्था विवेक से तय होती है। भारतीय संविधान आस्था की स्वतंत्रता देता है। लेकिन अगर इस आस्था को प्रलोभनों के जरिए बंधक बना लिया जाता है, तो मेरे हिसाब से यह आस्था की स्वतंत्रता का हनन है।”
उपराष्ट्रपति धनखड़ ने जोर देकर कहा कि ‘हम लोग’ की संप्रभुता को कमजोर नहीं किया जाना चाहिए। “भारत में दुनिया की आबादी का छठा हिस्सा निवास करता है। यह सबसे पुराना, सबसे बड़ा, सबसे जीवंत और कार्यात्मक लोकतंत्र है। भारत दुनिया का एकमात्र ऐसा देश है, जिसमें गांव से लेकर राष्ट्रीय स्तर तक संवैधानिक रूप से संरचित लोकतांत्रिक संस्थाएं हैं। हमारे संविधान की प्रस्तावना ‘हम लोग’ को शासन के आधारभूत स्रोत और आधार के रूप में इंगित करती है। संविधान की प्रस्तावना न्याय, समानता और सभी के लिए बंधुत्व के रूप में शासन के उद्देश्य को भी प्रकट करती है। हमें ‘हम लोग’ – संप्रभुता का अंतिम भंडार की रूपरेखा की सराहना करनी चाहिए। संप्रभुता जिसे हम कमजोर करने या छीनने का जोखिम नहीं उठा सकते।”
दिवंगत मुरली देवड़ा को सम्मानित करते हुए उपराष्ट्रपति ने उन्हें राजनीति में सबसे बेहतरीन सार्वजनिक हस्तियों में से एक बताया। उन्होंने कहा, “मुरली देवड़ा राजनीति में सबसे बेहतरीन सार्वजनिक हस्तियों में से एक थे, जिन्होंने जीवन भर दोस्ती निभाई। उन्होंने मतभेदों को दूर किया और सबका प्यार जीता। अपने जीवन में, उन्हें एक ही चीज की कमी महसूस हुई, वो यह कि उनका कोई विरोधी नहीं था। ऐसी उनकी शख्सियत थी। उनके साथी प्यार से उन्हें मुरली भाई कहते थे। मुरली भाई सार्वजनिक भावना और योग्य सामाजिक उद्देश्यों के प्रति समर्पण का उदाहरण थे।”
उपराष्ट्रपति ने सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध लगाने में मुरली देवड़ा की अग्रणी भूमिका की प्रशंसा करते हुए कहा, “मुरली देवड़ा को देश को धूम्रपान के खतरों से बचाने के उनके सक्रिय प्रयासों के लिए हमेशा याद किया जाएगा। उन्होंने देश की सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाया और सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान पर प्रतिबंध लगाने के लिए सकारात्मक हस्तक्षेप की मांग की।”
अपने संबोधन का समापन करते हुए, उपराष्ट्रपति धनखड़ ने मुरली देवड़ा के जीवन को सेवा की यात्रा के रूप में नेतृत्व का प्रमाण बताया। उन्होंने कहा, “मुरली देवड़ा जी का जीवन नेतृत्व के विचार का प्रमाण था। और, यह विचार एक आसन नहीं बल्कि तीर्थयात्रा है, जिसमें अंतिम, सबसे कमतर और अकेले व्यक्ति तक की सेवा यात्रा है।”
इस अवसर पर महाराष्ट्र के राज्यपाल सीपी राधाकृष्णन, महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, राज्यसभा सांसद और वरिष्ठ कोटक प्रतिनिधि मिलिंद देवड़ा, कोटक महिंद्रा बैंक के अध्यक्ष राघवेंद्र सिंह और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित थे।
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