गुजरात देश के उन राज्यों में से एक है जो अपने कई हिस्सों में इतिहास को संजोए हुए हैं। इन कई हिस्सों में से एक है लोथल। जल्द ही यहां देश का पहला नेशनल मैरीटाइम हैरिटेज म्यूज़ियम कॉम्प्लेक्स बनने जा रहा है। इसके लिए सरकार ने बजट में 3150 करोड़ रुपये की राशि दी है।
देश के 5,000 साल के समुद्री इतिहास को समर्पित इस संग्रहालय को मूर्त रूप देने के लिए हाल ही में पत्तन, पोत परिवहन एवं जलमार्ग मंत्रालय (MoSPW) एवं सांस्कृतिक मंत्रालय के बीच ‘राष्ट्रीय समुद्री विरासत परिसर (NMHC) के विकास में सहयोग’ समझौते पर हस्ताक्षर किए गए हैं।
लोथल के इतिहास के बारे में बात करें तो यह साबरमती नदी के किनारे पर बसा एक प्रचीन नगर था जो अब गुजरात के अहमदाबाद में मौजूद है। माना जाता है कि यह करीब चार हज़ार साल पहले अस्तित्व में आया। हालांकि इसके असली स्वरूप की जानकारी तब मिली जब भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की टीम ने 1954 में इस जगह का दौरा किया। एक खास सभ्यता की खोज में यहां की खुदाई शुरू हो गई जो श्री रंगनाथ राव के नेतृत्व में 13 फरवरी 1955 से लेकर 19 मई 1956 तक करीब एक साल चली। इस खुदाई से मिले अवशेष बताते हैं कि ‘लोथल’ सिंधु घाटी सभ्यता वाला शहर था जो अपने आप में पूर्ण रुप से विकसित था। लोथल के खंडहर आज भी प्राचीन समाज, संरचना और अर्थव्यवस्था को दर्शाते हैं जो कई सालों पहले यहां बसती थी। क्योंकि हड़प्पा और मोहनजोदड़ो अब देश की वर्तमान सीमाओं से बाहर चले गए हैं इसलिए लोथल पर पुरातत्वविदों और इतिहासकारों की खोज चलती रहती है।
लोथल को समुद्र के रास्ते आए व्यापारियों ने एक बस्ती के रूप में बसाया था जहां धीरे-धीरे राजमिस्त्री, लोहार और कुम्हार आकर रहने लगे थे और समुद्र आधारित कारोबार के कारण लोथल एक प्रसिद्ध ओद्यौगिक केंद्र के साथ-साथ प्रमुख बंदरगाह बन गया। लोथल को 3 बार बाढ़ ने पूरी तरह से क्षतिग्रस्त कर दिया था लेकिन बार-बार इनका पुनर्निमाण करके इसे दोबारा बनाया गया और धीरे-धीरे यह कस्बा एक शहर में परिवर्तित हो गया।
बंदरगाह लोथल की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक है। यह सिंधु सभ्यता का प्रमुख बंदरगाह था जहां सबसे बड़ा निर्माण गोदीबाड़ा यानि डॉकयार्ड पाया गया। इससे पहले इतने पुराने बंदरगाह के अवशेष कहीं से भी नहीं पाये गये हैं। आज भी लोथल में बंदरगाह के अवशेष अच्छी स्थिति में हैं।
लोथल के इसी ऐतिहासिक महत्व को देखते हुए सरकार ने यहां देश का पहला मैरीटाइम हैरिटेज कॉम्प्लेक्स बनाने का फ़ैसला किया है। मिनिस्ट्री ऑफ शिपिंग, मिनिस्ट्री ऑफ कल्चर और गुजरात सरकार मिलकर इस प्रोजेक्ट पर काम करेंगे जिसका पहला चरण जुलाई 2023 तक पूरा हो जाएगा। केंद्र सरकार की सागरमाला परियोजना के तहत बनने वाले इस म्यूजियम में ऑर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया भी अहम भूमिका निभा रहा है। इसकी आधारशिला पीएम मोदी ने पिछले साल 2019 में ही रख दी थी और इसका निर्माण लिस्बन में बने म्यूज़ियम की तर्ज पर किया जाएगा।
इस म्यूज़ियम में विभिन्न कलाकृतियों की प्रदर्शनी के साथ-साथ यह समुद्री पुरातत्व के
स्वतंत्र अनुसंधान केंद्र के रूप में भी कार्य करेगा । एक तरफ़ यह भारत की समृद्ध और विविधता से भरपूर समुद्री विरासत को दिखाएगा, वहीं दूसरी ओर यह भारत के समुद्री जनजीवन से जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों को भी सामने रखने की कोशिश करेगा। इस म्यूज़ियम में 1824-1962 के बीच हिंद महासागर के तटीय जलक्षेत्र में मिले जहाज़ों के अवशेष भी रखे जाएंगे।
मैरीटाइम हैरीटेज म्यूज़ियम के अलावा यहां थीम पार्क, मैरिटाइम रिसर्च इंस्टीट्यूट, नेचर कंज़रवेशन पार्क से लेकर होटल समेत सभी सुविधाएं उपलब्ध होंगी। आधुनिक तकनीक से लैस यह कॉम्प्लेक्स अपने आप में कई खूबियों से लैस होगा। सरकार का मकसद इस कॉम्प्लेक्स के जरिए यहां आने वालों पर्यटकों को भारत की समृद्ध समुद्री विरासत के बारे में जानकारी देने के साथ-साथ प्रेरित करना भी है।
भारत में समुद्री विरासत का इतिहास ईसा से लगभग तीन हजार साल पुराना है, जब सिंधु घाटी सभ्यता यहां फलफूल रही थी। समुद्र के रास्ते भारत में मेसोपोटामिया, बेबीलोन जैसी सभ्यताएं आईं। जल मार्ग ही वह ज़रिया था जिससे यूरोप और अफ्रीका से भारत के कारोबारी संबंध फले-फूले। इस तरह भारत का समुद्री इतिहास अपने आप में बहुत कुछ संजोए है जिसे लोगों तक पहुंचाना आवश्यक है। लोथल में बनने वाला यह म्यूज़ियम इस आवश्यकता को पूरा करेगा और भारत के समुद्री इतिहास को नई पहचान देगा।
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