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राष्ट्रपति कोविन्द ने भारतीय नौसेना के 22वें मिसाइल वेसल स्क्वाड्रन को राष्ट्रपति मानक प्रदान किया

राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आज मुंबई में एक औपचारिक समारोह में भारतीय नौसेना के 22वें मिसाइल वेसल्स स्क्वाड्रन को ‘राष्ट्रपति मानक’ प्रदान किया। राष्ट्रपति का मानक किसी सैन्य इकाई द्वारा राष्ट्र के लिए की गई सेवा को मान्यता देने के लिए सर्वोच्च कमांडर द्वारा दिया जाने वाला सर्वोच्च सम्मान है।

इस अवसर पर बोलते हुए राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि “इस स्क्वाड्रन को मानक का दिया जाना इसके अतीत और वर्तमान के अधिकारियों और नाविकों द्वारा हमारे देश के लिए की गई असाधारण सेवाओं का प्रमाण है।” उन्होंने पचास साल पहले 1971 के युद्ध के दौरान पाकिस्तानी नौसेना के जहाजों को डुबोने में 22वीं मिसाइल स्क्वाड्रन द्वारा निभाई गई भूमिका को याद किया।

आत्म निर्भर भारत की दृष्टि के हिस्से के रूप में स्वदेशीकरण के प्रति भारतीय नौसेना की प्रतिबद्धता पर प्रसन्नता व्यक्त करते हुए राष्ट्रपति ने कहा, “नौसेना की यह प्रतिबद्धता छत्रपति शिवाजी महाराज को एक श्रद्धांजलि है जिन्हें कई इतिहासकार सत्रहवीं शताब्दी में युद्ध के लिए तैयार भारतीय नौसैनिक बल के संस्थापक के रूप में मानते हैं।”

राष्ट्रपति ने कहा कि भारत-प्रशांत महासागर क्षेत्र में उभरती भू-राजनीतिक चुनौतियों ने देश को एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अवसर दिया है। उन्होंने कहा कि “वैश्विक समुद्री व्यापार का एक बड़ा हिस्सा हिंद महासागर क्षेत्र से होकर गुजरता है। इसलिए, न केवल हमारे लिए बल्कि पूरे वैश्विक समुदाय के लिए भी इस क्षेत्र में शांति बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण है।” राष्ट्रपति कोविंद ने कहा कि दुनिया की प्रमुख नौसेनाओं में से एक भारतीय नौसेना को हमारे समुद्री पड़ोसी हिंद महासागर क्षेत्र में एक पसंदीदा सुरक्षा भागीदार के रूप में देखते हैं।

राष्ट्रपति कोविंद ने मानवीय संकटों तथा प्राकृतिक आपदाओं के दौरान लोगों की सहायता करने में भारतीय नौसेना द्वारा निभाई गई भूमिका की भी सराहना की। उन्होंने पिछले साल कोविड 19 और महाराष्ट्र-गुजरात तट पर चक्रवात के दौरान बचाव कार्यों में नागरिकों के प्रत्यावर्तन में इसकी भूमिका की भी प्रशंसा की।

22वीं मिसाइल वेसल स्क्वाड्रन

22वीं मिसाइल वेसल स्क्वाड्रन को औपचारिक रूप से अक्टूबर 1991 में मुंबई में दस ‘वीर श्रेणी’ और तीन ‘प्रबल श्रेणी’ मिसाइल नौकाओं के साथ स्थापित किया गया था। हालांकि, ‘मारक’ की उत्पत्ति तो इससे पहले ही वर्ष 1969 में हो गई जब भारतीय नौसेना की ताकत को बढ़ाने के लिए तत्कालीन सोवियत रूस से ओएसए-1 क्लास मिसाइल बोट शामिल किया गया था।

दिसंबर 04-05, 1971 की रात को युवा भारतीय नौसेना के सबसे कम उम्र के योद्धाओं ने दुश्मन का पहला खून बहाया जब उन्होंने पाकिस्तानी नौसेना पर एक विनाशकारी आक्रमण किया। भारतीय नौसेना के ‘निर्घट’, ‘निपत’ और ‘वीर’ जहाजों ने अपनी स्टाइक्स मिसाइलें दागीं और पाकिस्तानी नौसेना के जहाजों ‘खैबर’ और ‘मुहाफ़िज़’ को डूबो दिया जिससे पाकिस्तानी नौसेना की आकांक्षाओं को घातक झटका लगा। ‘ऑपरेशन ट्राइडेंट’ गुप्तनाम वाले इस ऑपरेशन को आधुनिक नौसैनिक इतिहास में सबसे सफल कार्यवाहियों में से एक माना जाता है जिसमें कोई भारतीय बल हताहत नहीं हुआ।

भारतीय नौसेना ने 8/9 दिसंबर की रात को एक और साहसी हमला किया जब आईएनएस ‘विनाश’ ने दो युद्धपोतों के साथ चार स्टाइक्स मिसाइलें दागी जिसमें पाकिस्तान नौसेना बेड़े के टैंकर ‘ढाका’ को डुबो दिया गया और कराची में ‘केमारी’ तेल भंडारण सुविधा को काफी नुकसान पहुंचाया गया। स्क्वाड्रन के जहाजों और सैनिकों के वीरतापूर्ण कार्यों के कारण ही इस स्क्वाड्रन ने ‘मारक’ की उपाधि अर्जित की।

राष्ट्रपति मानक की प्रस्तुति के महत्वपूर्ण अवसर पर ‘मारक स्क्वाड्रन’ के कुछ पुराने सैनिक भी पुरस्कार समारोह में उपस्थित थे जिन्होंने राष्ट्रपति से प्रशंसा पाई और उपस्थित मेहमानों से तालियां बटोरीं।

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