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उपभोक्ता कार्य विभाग ने “राइट टू रिपेयर” पर समग्र प्रारूप विकसित करने के लिये समिति का गठन किया

सतत खपत के माध्यम से एलआईएफई-लाइफ (लाइफस्टाइल फॉर दी एनवायरेन्मेंट) आंदोलन को गति देने के प्रयासों के तहत उपभोक्ता कार्य विभाग ने “राइट टू रिपेयर” के लिये एक आमूल प्रारूप विकसित करने की दिशा में महत्त्वपूर्ण पहल की है।

भारत में उपभोक्ता उत्पादों में क्रेता द्वारा स्वयं सुधार करने या उनकी मरम्मत करने का प्रारूप तैयार करने का लक्ष्य स्थानीय बाजारों के उपभोक्ताओं तथा उत्पाद क्रेताओं को अधिकार सम्पन्न बनाना है। इस कदम से मूल उपकरण निर्माताओं और तीसरे पक्ष के खरीददारों तथा विक्रेताओं के बीच कारोबार सरल बनेगा, उत्पादों की तर्कसंगत खपत को विकसित करने को मजबूती मिलेगी और ई-कचरे में कमी आएगी। भारत में इसके शुरू हो जाने के बाद, उत्पादों के स्वरूप में भारी बदलाव आ जाएगा और तीसरे पक्ष द्वारा उपकरणों की मरम्मत/सुधार की अनुमति मिलने से आत्मनिर्भर भारत के जरिये रोजगार भी पैदा होंगे।

इस सम्बंध में विभाग ने एक समिति का गठन किया है, जिसकी अगुवाई उपभोक्ता कार्य विभाग की अपर सचिव निधि खरे करेंगी। समिति में उपभोक्ता कार्य विभाग के संयुक्त सचिव अनुपम मिश्र, पंजाब व हरियाणा उच्च न्यायलय के पूर्व न्यायाधीश तथा पंजाब के राज्य उपभोक्ता विवाद निस्तारण आयोग के पूर्व अध्यक्ष न्यायमूर्ति परमजीत सिंह धालीवाल, राजीव गांधी राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, पटियाला के कुलपति प्रो. (डॉ.) जी.एस. बाजपेयी, उपभोक्ता विधि और विधिक कार्य पीठ के प्रो. अशोक पाटिल, आईसीईए, एसआईएएम, उपभोक्ता कार्यकर्ता और उपभोक्ता संगठनों के विभिन्न हितधारकों को सदस्य बनाया गया है।

समिति की पहली बैठक 13 जुलाई, 2022 को हुई, जिसमें “राइट टू रिपेयर” के लिये अहम सेक्टरों की पहचान की गई। इनमें खेती उपकरणों, मोबाइल फोन/टेबलेट, उपभोक्ता सामान और मोटर-वाहन/मोटर-वाहन उपकरणों में सुधार करने तथा उन्हें दुरुस्त करने के अधिकार के तहत चिन्हित किया गया।

जिन अहम मुद्दों को बैठक के दौरान रेखांकित किया गया, उनमें यह बात भी शामिल थी कि उपभोक्ता कंपनियां उत्पादों की जानकारी देने वाली पुस्तिकाओं का प्रकाशन करने से बचती हैं, जबकि इनसे उपभोक्ता आसानी से अपने उपकरण की मरम्मत कर सकता है। निर्माताओं का फुटकर पुर्जों पर भी नियंत्रण रहता है, यानी ऐसे पेंच और अन्य पुर्जे, जिनकी डिजाइन उक्त कंपनी ही करती है। मरम्मत की पूरी प्रक्रिया पर कंपनियों का एकाधिकार होने से उपभोक्ताओं के “चयन का अधिकार” का उल्लंघन होता है। उदाहरण के लिये डिजिटल वारंटी कार्ड में यह लिखा होता है कि अगर उपभोक्ता ने किसी “गैर-मान्यताप्राप्त” मिस्त्री से उपकरण ठीक करवाया या दिखवाया, तो उपभोक्ता वारंटी का हक खो देगा। डिजिटल अधिकार प्रबंधन (डीआरएम) और प्रौद्योगिकीय संरक्षण उपाय (टीपीएम) से कॉपी-राइट रखने वालों को बहुत राहत मिलती है। निर्माता “जानबूझकर कम समय तक चलने वाली” चीजें बनाते हैं। यह ऐसा तरीका है, जिसमें कोई भी गैजट एक खास समय तक ही चलता है और वह समय समाप्त हो जाने के बाद उसे बदलना पड़ता है। इस तरह खरीददार के अधिकारों को चोट पहुंचती है।

चर्चा के दौरान, यह जरूरत महसूस की गई कि टेक-कंपनियों को उत्पादों के मैनुअल, पुस्तिकाओं और सॉफ्टवेयर अपडेट की पूरी जानकारी उपलब्ध करानी चाहिये। इसके लिये ऐसा न हो कि उत्पादों की बिक्री की पारदर्शिता पर सॉफ्टवेयर लाइसेंस रोक लगा दे। निदान सम्बंधी यंत्रों सहित उपकरणों और यंत्रों को तीसरे पक्ष तथा लोगों को उपलब्ध कराया जाना चाहिये, ताकि मामूली गड़बड़ियों को ठीक किया जा सके। सौभाग्य से हमारे देश में जीवंत रिपेयर सेवा सेक्टर और मरम्मत करने का तीसरा पक्ष मौजूद है। इस सेक्टर में वे लोग भी शामिल हैं, जो चक्रिय अर्थव्यवस्था के तहत उत्पादों के लिये फुटकर पुर्जे उपलब्ध कराते हैं।

इसके अलावा, यह भी देखा जाना चाहिये कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर के तौर-तरीकों के मद्देनजर अन्य देशों द्वारा की गई पहलों को भारत में कैसे शामिल किया जाये। बैठक में इस विषय पर भी चर्चा की गई। दुनिया के तमाम देशों में “राइट टू रिपेयर” को माना जाता है। इन देशों में अमेरिका, यूके और यूरोपीय संघ शामिल हैं। अमेरिका में फेडरल ट्रेड कमीशन ने निर्माताओं को निर्देश दिया है कि वे गलत गैर-प्रतिस्पर्धात्मक व्यवहार को सुधारें। उनसे कहा गया है कि वे यह सुनिश्चित करें कि उपभोक्ता भी चाहें तो खुद मरम्मत का काम कर लें या किसी तीसरे पक्ष की एजेंसी से यह काम करवायें।

हाल में यूके ने एक ऐसा ही कानून पारित किया है, जिसमें सभी इलेक्ट्रॉनिक सामान निर्माताओं को शामिल किया गया है, ताकि उपभोक्ताओं को पुर्जे मिल सकें और वे या तो स्वयं अथवा किसी तीसरे पक्ष से या मरम्मत करने की स्थानीय दुकानों से मरम्मत का काम करवा सकें। ऑस्ट्रेलिया में “रिपेयर कैफे” एक विशेष प्रणाली काम करती है। ये ऐसे स्थान हैं, जहां स्वयंसेवी मिस्त्री एकत्र होते हैं और मरम्मत का कौशल दिखाते हैं। यूरोपीय संघ ने भी कानून पारित किया है, जिसके तहत निर्माताओं से कहा गया है कि वे दस वर्षों तक मिस्त्रियों को उत्पादों के पुर्जे उपलब्ध करायें।

पिछले महीने, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारत में लाइफ (लाइफस्टाइल फॉर दी एनवायरेन्मेंट) आंदोलन की अवधारणा का शुभारंभ किया था। इसमें विभिन्न उपभोक्ता उत्पादों को दोबारा इस्तेमाल करने और उनकी री-साइक्लिंग का विचार शामिल है। दोबारा इस्तेमाल करने के हवाले से उत्पादों की मरम्मत करना एक अहम प्रक्रिया है। यह उत्पादों का लंबे समय तक चलने के लिये भी जरूरी है। ऐसा उत्पाद जिसकी मरम्मत नहीं हो सकती या जो योजनाबद्ध तरीके से कम समय तक चलने के लिये बनाया गया है, यानी उसकी ऐसी डिजाइन बनाई गई है कि वह सीमित समय तक ही चलता हो, ऐसे उत्पादों से न केवल ई-कचरा बढ़ता है, बल्कि यह उपभोक्ताओं को नये उत्पाद खरीदने पर मजबूर भी करता है, क्योंकि दोबारा इस्तेमाल करने के लिये इन उत्पादों की मरम्मत नहीं की जा सकती। इस तरह, मरम्मत की संभावना खत्म कर देने से उपभोक्ता को उस उत्पाद के नये मॉडल को खरीदने पर मजबूर होना पड़ता है।

लाइफ आंदोलन उत्पादों के तर्कसंगत और समझ-बूझकर इस्तेमाल करने की बात कहता है। “राइट टू रिपेयर” के पीछे तर्क यह है कि जब हम कोई उत्पाद खरीदते हैं, तो उसमें यह बात निहित होती है कि हम उसके पूरे मालिक हैं तथा इसके लिये उपभोक्ताओं को यह अधिकार है कि वह आसानी से तथा सस्ते में उत्पाद की मरम्मत या उसमें सुधार कर सके। इसके लिये उसे निर्माताओं के नखरे नहीं सहने पड़ें। बहरहाल, समय बीतने के साथ देखा जा रहा है कि “राइट टू रिपेयर” पर लगाम लगाई जा रही है। मरम्मत के काम में अनावश्यक विलंब होता है, और कभी-कभी उत्पादों की मरम्मत की बहुत ज्यादा कीमत वसूली जाती है। इसके कारण उपभोक्ता के पास कोई विकल्प नहीं बचता। अकसर पुर्जे उपलब्ध नहीं होते, जिसके कारण उपभोक्ता को मुश्किलों और परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

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