संसद ने प्रकाश स्तम्भ अधिनियम 1927 को निरस्त और ‘नौचालन के लिए सामुद्रिक सहायता विधेयक 2021’ को पारित किया

संसद ने प्रकाश स्तम्भ अधिनियम 1927 को निरस्त और ‘नौचालन के लिए सामुद्रिक सहायता विधेयक 2021’ को पारित किया

संसद ने नौचालन के लिए सामुद्रिक सहायता विधेयक 2021 को पारित किया। इस विधेयक का उद्देश्य 90 साल से अधिक पुराने प्रकाश स्तम्भ अधिनियम 1927 को प्रतिस्थापित करना, सर्वोत्तम वैश्विक प्रथाओं, तकनीकी विकास और नौचालन के लिए सामुद्रिक सहायता के क्षेत्र में भारत के अंतरराष्ट्रीय दायित्वों का समायोजन करना, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दृष्टिकोण को साकार करना, विधायी ढांचे को उपयोगकर्ताओं के अनुकूल बनाना और व्यापार करने की आसान प्रक्रिया को बढ़ावा देनाहै। केन्द्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने इस विधेयक को राज्यसभा में 19.07.2021 को पेश किया और आज इसे पारित कर दिया गया। अब यह विधेयक राष्ट्रपति के पास उनकी मंजूरी के लिए जाएगा।

केन्द्रीय पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्री सर्बानंद सोनोवाल ने कहा कि यह पहल औपनिवेशिक कानूनों को निरस्त करके उन्हें समुद्री उद्योग की आधुनिक एवं समकालिक जरूरतों को पूरा करने वाले कानूनों से प्रतिस्थापित करने की पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के सक्रिय दृष्टिकोण का हिस्सा है। सर्बानंद सोनोवाल ने यह भी कहा कि इस विधेयक का उद्देश्य समुद्री नौचालनसे संबंधित उन अत्याधुनिक तकनीकों को अपनाना है, जो पुराने प्रकाश स्तम्भ अधिनियम 1927 के वैधानिक प्रावधानों के तहत शामिल नहीं थे।

पृष्ठभूमि:

सुरक्षित नौचालन के लिए भारत में प्रकाश स्तम्भ एवं दीपक का प्रशासन एवं प्रबंधन प्रकाश स्तम्भ अधिनियम 1927 द्वारा प्रशासित है। प्रकाश स्तम्भ अधिनियम 1927 के अधिनियमन के समय, तत्कालीन ब्रिटिश भारत में केवल 32 प्रकाश स्तम्भ थे, जो कि छह क्षेत्रों – अदन, कराची, बम्बई, मद्रास, कलकत्ता और रंगून – में फैले हुए थे। आजादी के बाद, 17 प्रकाश स्तम्भ भारत के प्रशासनिक नियंत्रण में आए। इनकी संख्या अब नौवहन उद्योग की बढ़ती जरूरतों को पूरा करने के लिए कई गुना बढ़ गई हैं। वर्तमान में, उक्त अधिनियम के तहत 195 प्रकाश स्तम्भ और नौचालन के लिए कई उन्नत रेडियो और डिजिटल सहायता संचालित हैं।

जैसे-जैसे तकनीक विकसित हुई, रडार और अन्य सेंसर की मदद से एक प्रणाली स्थापित की गई, तट से जहाजों को उनकी स्थिति के बारे में सलाह दी गई और इस तरह पोत परिवहन सेवाएं [वेसल ट्रैफिक सर्विसेज (वीटीएस)] अस्तित्व में आई और उसे व्यापक स्वीकार्यता मिली। समुद्री नौवहन प्रणालियों के इन आधुनिक, तकनीकी रूप से बेहतर सहायता ने उन सेवाओं के स्वरूप को एक ‘निष्क्रिय’ सेवा से ‘निष्क्रिय और साथ ही संवादात्मक’ सेवा में बदल दिया है।

वैश्विक स्तर पर इन प्रकाश स्तम्भों को दर्शनीय स्थल, विशिष्ट वास्तुकला एवं धरोहर मूल्य की दृष्टि से एक प्रमुख पर्यटक केन्द्र के रूप में भी पहचान मिली है।

नौचालन से संबंधित गतिविधियों को एक उपयुक्त वैधानिक ढांचा प्रदान करने के लिए एक ऐसे नए अधिनियम के अधिनियमन की आवश्यकता है जो कि नौचालन के लिए सामुद्रिक सहायता की आधुनिक भूमिका को दर्शाए और अंतर्राष्ट्रीय करारों के तहत भारत के दायित्वों के अनुरूप हो।

लाभ:

यह नया अधिनियम भारतीय तटीयसीमा के अंतर्गत समुद्री नौचालन के लिए सहायता और पोत परिवहन सेवाओं के लिए व्यवस्थित और प्रभावी कामकाज की सुविधा प्रदान करेगा। इसके लाभों में शामिल हैं-

इसमें नौचालन के लिए सहायता एवं पोत परिवहन सेवाओं से संबद्ध मामलों के लिए बेहतर कानूनी ढांचा और समुद्री नौचालन के क्षेत्र में भावी विकास शामिल है।

नौवहन की सुरक्षा एवं दक्षता बढ़ाने और पर्यावरण को संरक्षित करने के लिए पोत परिवहन सेवाओं का प्रबंधन।
अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप ‘नौचालन के लिए सहायता’ और पोत परिवहन सेवाओं के ऑपरेटरों के लिए प्रशिक्षण और प्रमाणन के माध्यम से कौशल विकास।
वैश्विक मानकों के अनुरूप प्रशिक्षण और प्रमाणन की जरूरतों को पूरा करने के लिए संबद्ध संस्थानों की लेखा परीक्षा और प्रत्यायन।
सुरक्षित और प्रभावी नौचालन के उद्देश्य से डूबे हुए/फंसे हुए जहाजों की पहचान करने के लिए सामान्य जल में “मलबे”  चिन्हित करना।
शिक्षा, संस्कृति और पर्यटन के उद्देश्य से प्रकाश स्तम्भों का विकास, जोकि तटीय क्षेत्रों की पर्यटन क्षमता का दोहन करते हुए उनकी अर्थव्यवस्था में योगदान देगा।

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