आम बजट 2023-24 में, प्रयोगशाला में लगाए गए हीरों (एलजीडी) मशीनरी, बीजों तथा नुस्खा के स्वदेशी उत्पादन को प्रोत्साहित करने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में से एक के लिए पांच वर्ष का शोध अनुदान दिए जाने की घोषणा की गई।
सरकार, निर्यात संवर्धन परिषद तथा उद्योग के प्रतिनिधियों की एक संयुक्त समिति द्वारा असकी क्षमताओं के एक संयुक्त निर्धारण के बाद आईआईटी-मद्रास को यह परियोजना दिए जाने का निर्णय किया गया। प्रयोगशाला में लगाए गए हीरों के लिए भारतीय केंद्र (इनसेंट -एलजीडी) को आईआईटी-मद्रास में पांच वर्षों के लिए 242.96 करोड़ रुपये की अनुमानित लागत से स्थापित करने का प्रस्ताव रखा गया है।
वाणिज्य सचिव सुनील बर्थवाल की अध्यक्षता में परियोजना मूल्यांकन समिति ने प्रस्ताव की अनुशंसा की है जिसे केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल द्वारा अनुमोदित किया गया है। बजट सहायता अगले पांच वर्षों के दौरान उपलब्ध कराई जाएगी।
इस परियोजना का लक्ष्य रसायनिक वाष्प जमाव (सीवीडी) तथा उच्च दबाव और उच्च तापमान (एचपीएचटी) दोनों प्रणालियों के स्वदेशी विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए देश में उद्योगों तथा उद्यमियों को मिशन मोड में तकनीकी सहायता प्रदान करना एवं अपस्ट्रीम छोर पर प्रयोगशाला में लगाए गए हीरों (एलजीडी) के व्यवसाय को विस्तारित करने के लिए विधि तैयार करना है। शोध के प्रयासों से स्टार्ट अप्स के लिए किफायती लागत पर प्रौद्योगिकी उपलब्ध होगी, रोजगार के अवसरों में वृद्धि होगी, एलजीडी के निर्यात में बझोतरी होगी और इस प्रकार यह भारत के आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
रत्न एवं आभूषण सेक्टर भारत की अर्थव्यवस्था में एक उल्लेखनीय भूमिका का निर्वाह करता है तथा भारत के कुल वस्तु निर्यात में लगभग 9 प्रतिशत का योगदान देता है। पिछले दशक के दौरान, वैश्विक स्तर पर रत्न एवं आभूषण सेक्टर में कई सकारात्मक घटनाक्रम हुए हैं। इस सेक्टर में एक प्रमुख प्रौद्योगिकीय घटनाक्रम प्रयोगशाला में लगाए गए हीरों (एलजीडी) का रहा है।
आभूषण उद्योग के अतिरिक्त, प्रयोगशाला में लगाए गए हीरों का उपयोग कंप्यूटर चिप्स, उपग्रहों, 5जी नेटवर्कों में किया जाता है क्योंकि उनका उपयोग सिलिकॉन आधारित चिप्स की तुलना में कम बिजली का उपयोग करते हुए उच्च गति पर काम करने की उनकी क्षमता के कारण चरम वातावरणों में किया जा सकता है। एलजीडी का रक्षा, ऑप्ट्क्सि, आभूषण, थर्मल एवं चिकित्सा उद्योग में व्यापक अनुप्रयोग है।
वैश्विक स्तर पर, इसका बाजार 2020 में 1 बिलियन डॉलर का था, प्रयोगशाला में लगाए गए हीरों के आभूषणों का बाजार तेजी से बढ़ कर 2025 तक 5 बिलियन डॉलर तक हो जाने एवं 2035 तक 15 बिलियन डॉलर से अधिक हो जाने की उम्मीद है।
पिछले पांच वर्षों में एवं चालू वर्ष के लिए कटे तथा परिष्कृत (काम किए हुए) प्रयोगशाला में लगाए गए हीरों का आयात निम्नलिखित है:
(मूल्य मिलियन डॉलर में)
वस्तु
2017-18
2018-19
2019-20
2020-21
2021-22
2022-23 (अप्रैल – दिसंबर 2022)
कटे तथा परिष्कृत (काम किए हुए) प्रयोगशाला में उगाए गए हीरे
237.89
274.75
473.65
637.97
1,348.24
1,387.33
प्रयोगशाला में लगाए गए हीरों का उत्पादन उच्च दबाव और उच्च तापमान (एचपीएचटी) तथा रसायनिक वाष्प जमाव (सीवीडी) नामक दो प्रौद्योगिकीयों के माध्यम से होता है। भारत सीवीडी प्रौद्योगिकी का उपयोग करने के माध्यम से प्रयोगशाला में उगाए गए हीरों के सबसे अग्रणी उत्पादक देशों में से एक है। उद्योग के अनुमान के अनुसार, वित्त वर्ष 2021-22 में भारत का हिस्सा वैश्विक व्यापार में 25.8 प्रतिशत था। बहरहाल, हमें महत्वपूर्ण, मशीनरी कंपोनेंट तथा ‘सीड्स‘ की आपूर्ति के लिए अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता है- जो सिंथेटिक हीरों के उत्पादन के लिए कच्चे माल हैं।
इसलिए, यह अनिवार्य है कि भारत प्राकृतिक हीरों के मामले में आयात पर निर्भरता दूर करने के लिए महत्वपूर्ण मशीनरी कंपोनेंट सीड्स के उत्पादन के लिए अपनी खुद की, स्वदेशी तकनीक विकसित करे। विकसित उपकरण एवं प्रोसेस मानकों से उत्पादित योग्य प्रमाणन के साथ अच्छी गुणवत्ता वाले प्रयोगशाला में उगाए गए हीरे कई विदेशी ग्राहकों को आकर्षित करेंगे जिससे प्रयोगशाला में उगाए गए हीरे की निर्यात मात्रा तथा उत्पादन की मापनीयता बढ़ेगी। प्रलेखित प्रक्रिया मानक और विकसित विधि नए उद्यमियों को प्रयोगशाला में उगाए गए हीरों के व्यवसाय मे्र प्रवेश करने के लिए प्रोत्साहित करेगा जिससे सुविधा केंद्र स्थापित करना, व्यवसाय प्रारंभ करना और रोजगार का सृजन करना सरल और लागत प्रभावी हो जाएगा।
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