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नीति आयोग ने राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (एनएचए) अनुमान जारी किए

नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) डॉ. विनोद के पॉल ने स्वास्थ्य एवं कल्याण मंत्रालय, केंद्र सरकार के सचिव श्री राजेश भूषण की मौजूदगी में 2018-19 के लिए भारत के राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (एनएचए) अनुमान जारी किए। इस दौरान पता चला कि भारत में स्वास्थ्य खर्च से जुड़े कई सूचकांकों में सकारात्मक सुधार हुआ है, जो नियमित तौर पर दिखाई भी देता रहा हैं।

2018-19 के लिए एनएचए अनुमानों के मुताबिक भारत की कुल जीडीपी में सरकारी स्वास्थ्य खर्च में इजाफा हुआ है। यह आंकड़ा 2013-14 में 1.15 फीसदी हुआ करता था, जो 2018-19 में बढ़कर 1.28 फीसदी हो गया है। साथ ही कुल स्वास्थ्य खर्च में सरकारी स्वास्थ्य खर्च भी समय के साथ बढ़ता गया है। 2018-19 में सरकारी खर्च की हिस्सेदारी 40.6 फीसदी थी, जो 2013-14 के 28.6 फीसदी से कहीं अधिक है।

एनएचए अनुमानों से यह भी पता चला है कि “मौजूदा स्वास्थ्य खर्च” की हिस्सेदारी में सरकार का स्वास्थ्य खर्च 2013-14 के 23.2 फीसदी से बढ़कर 2018-19 में 34.5 फीसदी हो गया है।

यह भी पाया गया कि 2013-14 के बाद से प्रति व्यक्ति सरकारी स्वास्थ्य खर्च में 74 फीसदी का इजाफा हुआ है, मतलब यह आंकड़ा 1042 रुपये प्रति व्यक्ति से बढ़कर, 2018-19 में 1815 रुपये हो गया।

सभी के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के मिशन पर ध्यान केंद्रित करते हुए सरकार प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा व्यय पर भी ध्यान दे रही है, जो 2013-14 में 51.1 फीसदी था, जबकि अब यह 55.2 फीसदी हो गया है। सरकार का यह कार्य, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति (एनएचपी) 2017 के सुझावों के साथ भी मेल खाता है।

प्राथमिक और द्वितीयक सेवा खातों की मौजूदा सरकारी स्वास्थ्य खर्च में 80 फीसदी से ज्यादा हिस्सेदारी है। निजी क्षेत्र के मामले में तृतीयक सेवा में इजाफा हुआ है, लेकिन प्राथमिक और द्वितीयक सेवा खर्च में गिरावट आई है। 2013-14 से 2018-19 के बीच में प्राथमिक और द्वितीयक सेवा में सरकार की हिस्सेदारी 74 फीसदी से बढ़कर 86 फीसदी हो गई। दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में इसी अवधि में इन दोनों सेवाओं की हिस्सेदारी 82 फीसदी से घटकर 70 रह गई है।

मौजूदा सरकारी स्वास्थ्य खर्च में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा की हिस्सेदारी (%)

इस तरह के कुछ कदमों के चलते, “आउट ऑफ पॉकेट” खर्च (ओओपीई) में कुल स्वास्थ्य खर्च से तुलना करने में 16 प्रतिशत बिन्दु तक की गिरावट आई है। अब यह इसकी हिस्सेदारी 64.2 फीसदी से गिरकर 48.2 फीसदी रह गई है।

“मौजूदा स्वास्थ्य खर्च की तुलना” में 2013-14 में ओओपीई 69.1 हुआ करता था, जो 2018-19 में घटकर 53.2 फीसदी रह गया।

प्रति व्यक्ति ओओपीई, 2013-14 की तुलना में फिलहाल 8 फीसदी कम हो गया है। मतलब पहले यह 2,366 रुपये हुआ करता था, जबकि वर्तमान में 2,155 रुपये प्रति व्यक्ति है।

सामाजिक सुरक्षा पर ध्यान केंद्रित करने के परिणामस्वरूप कुल स्वास्थ्य खर्च 6 फीसदी से बढ़कर 9.6 फीसदी हो गया है।

एनएचए से यह भी पता चलता है कि सरकार द्वारा वित्त पोषित स्वास्थ्य बीमा खर्च में भी 2013-14 से 167 फीसदी का इजाफा हुआ है।

2018-19 के लिए एनएचए अनुमान बताते हैं कि देश में स्वास्थ्य सेवा क्षेत्र में विदेशी निवेश पर भरोसा कम हो रहा है। रिपोर्ट बताती है कि 2004-05 में विदेशी सहायता 2.3 फीसदी थी, जो 2018-19 में घटकर 0.4 फीसदी रह गई है। इससे भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता प्रदर्शित होती है।

तालिका 1: व्यापक “हेल्थ फाइनेंसिंग-मैक्रोइक्नॉमिक” सूचकांकों का ट्रेंड

सूचकांक

2017-18 (करोड़ रुपये में)

2018-19 (करोड़ रुपये में)

बदलाव (प्रतिशत में)

सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी)
1,70,90,042
1,88,99,668
11%

सामान्य सरकारी खर्च (जीजीई)
45,15,946
50,40,707
12%

कुल स्वास्थ्य खर्च (टीएचई)
5,66,644
5,96,440
5%

सरकारी स्वास्थ्य खर्च (जीएचई)
2,31,104
2,42,219
5%

एनएचए अनुमान रिपोर्ट के पेश किेए जाने के मौके पर डॉ. वी. के. पॉल ने कहा, “यह हमारे लिए गर्व की बात है कि हमारे देश में स्वास्थ्य खर्च पर योजनाबद्ध, सुदृढ़, विश्वसनीय और पारदर्शी खाते और उसकी परीक्षण प्रक्रिया है। इस तरह की रिपोर्टों से हमें राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के साथ समानांतर, बेहतर फैसले लेने में मदद मिलेगी।” बता दें 2013-14 के बाद से यह लगातार छठवीं रिपोर्ट जारी की गई है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र (एनएचएसआरसी) ने सुनिश्चित किया है कि ऐसी रिपोर्ट बिना किसी हस्तक्षेप के प्रकाशित हों और उनमें कड़ी अकादमिक मेहनत हो। चूंकि इन रिपोर्टों का इस्तेमाल शोधार्थी, नीति-निर्माता और कार्यक्रमों को लागू करवाने वाले लोग करते हैं, इसलिए इन्हें बेहतर तरीके से बनाया जाना जरूरी है।

डॉ. पॉल ने कहा कि पिछले कुछ सालों से सरकार ने इस आधार पर नीतियां सुनिश्चित की हैं कि आम नागरिकों की जेब से स्वास्थ्य पर कम से कम खर्च हो, क्योंकि यह खर्च लोगों और परिवारों को गरीबी की ओर ढकेलता है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा अनुमान 2018-19 जब आज जारी किया जा रहा है, तब ओओपीई में 2014 की तुलना में 2018-19 में 16 प्रतिशत बिन्दु की अहम कमी आई है। यहां तक कि प्रति व्यक्ति ओओपीई में भी कमी देखी गई है। रिपोर्ट में भारत और दूसरे देशों में प्रति व्यक्ति ओओपीई की तुलना को भी दर्शाया गया है, इसके लिए डब्ल्यूएचओ द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाले वैश्विक स्वास्थ्य खर्च डेटाबेस का इस्तेमाल किया गया है। 189 देशों में भारत ओओपीई के मामले में 66वें स्थान पर है।

केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव श्री राजेश भूषण ने सरकारी खर्च में बदलती प्रवृत्ति पर ध्यान केंद्रित किया। प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा पर ध्यान केंद्रित करने से पता चलता है कि सरकार ने देश में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा को प्राथमिकता देने का फैसला किया है। रिपोर्ट बताती है कि आज सरकारी खर्च का 55.2 फीसदी, सिर्फ प्राथमिक स्वास्थ्य पर ही खर्च किया जा रहा है। इससे ना केवल जमीनी स्तर पर गुणवत्तापूर्ण सेवा उपलब्ध हो पा रही है, बल्कि इससे द्वितीयक और तृतीयक सेवा की जरूरत वाली बीमारियों के होने की संभावना भी कम हो रही है।

श्री राजेश भूषण ने कुल स्वास्थ्य खर्च में सामाजिक सुरक्षा पर होने वाले खर्च की हिस्सेदारी पर भी बात की। स्वास्थ्य पर सामाजिक सुरक्षा खर्च में सामाजिक स्वास्थ्य बीमा कार्यक्रम, सरकार द्वारा पोषित स्वास्थ्य बीमा योजनाएं और सरकारी कर्मचारियों को इलाज के बाद मिलने वाले मेडिकल भुगतान आते हैं, 2013-14 में कुल स्वास्थ्य खर्च में इसकी हिस्सेदारी 6 फीसदी थी, जो 2018-19 में बढ़कर 9.6 फीसदी हो गई है। यह एक अहम बढ़ोत्तरी है, जो बताती है कि अब भारत के लोगों के पास स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच के बेहतर विकल्प हैं और उनके दरवाजे तक बेहतर ढंग से स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाई जा रही हैं।

राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (एनएचए) अनुमानों के बारे में:

2018-19 के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य लेखा (एनएचए) अनुमान, 6वां एनएचए अनुमान है, इसकी रिपोर्ट एनएचएसआरसी ने तैयार की है, जिसे 2014 में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने “नेशनल हेल्थ अकाउंट्स टेक्निकल सेक्रेटेरिएट (एनएचएटीएस) का दर्जा दिया था। इन अनुमानों को डब्ल्यूएचओ द्वारा बनाए गए फ्रेमवर्क के आधार पर तैयार किया जाता है, जो स्वास्थ्य लेखा परीक्षण का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मानक तंत्र है।

एनएचए के मौजूदा अनुमान आने के बाद, अब भारत के पास 2013-14 से लगातार 2018-19 तक के अनुमान मौजूद हैं।

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