उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने आज सरदार वल्लभभाई पटेल को उनकी जयंती पर भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। भारत के लौह पुरुष के योगदान की सराहना करते हुए उन्होंने कहा कि सभी राज्यों का सफल एकीकरण सरदार पटेल की बहुत बड़ी उपलब्धि थी। उन्होंने कहा कि जम्मू-कश्मीर को छोड़कर सभी राज्यों के एकीकरण का काम सरदार वल्लभभाई पटेल को सौंपा गया था और हम जानते हैं कि उन्हें किस तरह की समस्या का सामना करना पड़ा था। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 के निरस्त होने से अब चीजें पटरी पर हैं और वैश्विक मान्यता मिल रही है।
यह देखते हुए कि मसौदा समिति के अध्यक्ष डॉ. बी.आर. अम्बेडकर ने अनुच्छेद 370 का मसौदा तैयार करने से इनकार कर दिया था। उपराष्ट्रपति ने इस बात पर खुशी व्यक्त की कि यह अब हमारे संविधान में नहीं है। उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 35-ए जम्मू-कश्मीर के लोगों को उनके मौलिक अधिकारों के लाभ से वंचित करता था। उपराष्ट्रपति ने कहा कि लोग पहली बार लोकतांत्रिक भारतीय शासन और इसके लाभों से अवगत हुए हैं।
आज भारतीय लोक प्रशासन संस्थान (आईआईपीए) की आम सभा की उनसठवीं वार्षिक बैठक को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने वर्षों से किए गए अच्छे कार्यों के लिए संस्थान की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि आईआईपीए का हर राज्य और केंद्र शासित प्रदेश में प्रभाव होना चाहिए, उपराष्ट्रपति ने संगठन से देश के हर हिस्से में, खासकर जिला स्तर पर अपनी पहुंच बनाने को कहा क्योंकि बड़े बदलाव जिला स्तर पर ही होते हैं। इस संबंध में स्व-लेखापरीक्षा का आह्वान करते हुए उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि किसी संस्था को ख़राब करने का सबसे अच्छा तरीका इसे जांच और आत्म-निरीक्षण से दूर रखना है।
‘कर्तव्य काल’ के माध्यम से साकार किए गए ‘अमृतकाल’ को ‘गौरवकाल’ बताते हुए उपराष्ट्रपति ने इस बात पर प्रकाश डाला कि ‘पारदर्शिता, जवाबदेही और उपलब्धि’ अब देश में नए मानदंड बन गए हैं। उन्होंने कहा कि सत्ता के गलियारे, जो कभी भ्रष्टाचार और सत्ता-दलालों से प्रभावित थे, अब पूरी तरह से स्वच्छ हो गए हैं और यह एक बड़ी उपलब्धि है।
बैठक को संबोधित करते हुए उपराष्ट्रपति ने आज संसद को “संवाद, बहस, विचार-विमर्श और चर्चा के लिए एक पवित्र सदन” के रूप में वर्णित किया। इसके साथ ही उन्होंने युवा सोच को संवेदनशील बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया जिससे वे सदन में अशांति और व्यवधान के नापाक नैरेटिव का प्रभावी ढंग से मुकाबला कर सकेंगे। सार्वजनिक अज्ञानता का फायदा उठाने के लिए कुछ हलकों की हालिया कोशिशों का जिक्र करते हुए उन्होंने इसे “हमारे समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा” बताया और इस खतरनाक प्रवृत्ति को तत्काल बेअसर करने का आग्रह किया।
2030 तक देश को तीसरी आर्थिक शक्ति बनाने के लक्ष्य के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत के हाल ही में पांचवें स्थान पर पहुंचने की सराहना करते हुए उपराष्ट्रपति धनखड़ ने “आर्थिक राष्ट्रवाद” की आवश्यकता पर जोर दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री के ‘वोकल फॉर लोकल’ आह्वान को दोहराया और कहा कि पतंग, दीया, मोमबत्तियां आदि जैसी बुनियादी रोजमर्रा के उपयोग की वस्तुओं के आयात से बहुमूल्य विदेशी मुद्रा की अनावश्यक बर्बादी के कारण पर्याप्त व्यापार घाटा होता है और इससे हमारे लोग उद्यमिता में शामिल होने से वंचित रह जाते हैं।
उपराष्ट्रपति ने देश में घरेलू कच्चे माल के मूल्यवर्धन पर ध्यान केंद्रित करने की अनिवार्यता पर जोर दिया और कहा कि यह ‘अर्थव्यवस्था के लिए क्रांतिकारी साबित होगा। उन्होंने 2047 तक वैश्विक नेता के रूप में भारत की स्थिति को सुरक्षित करने के साधन के रूप में इस दृष्टिकोण की कल्पना की। उन्होंने कहा कि इस योगदान के कई सकारात्मक परिणाम होंगे क्योंकि ‘सरकार कराधान से कमाई करेगी, लोगों को रोजगार मिलेगा और उद्यमिता फलेगी-फूलेगी।’
कार्यक्रम के दौरान, उपराष्ट्रपति ने राष्ट्रीय एकता दिवस पर राष्ट्रीय एकता की शपथ भी दिलाई। उन्होंने अकादमिक उत्कृष्टता के लिए पॉल एच. एप्पलबी पुरस्कार और डॉ. राजेंद्र प्रसाद पुरस्कार सहित विभिन्न प्रतिष्ठित पुरस्कार भी प्रदान किए।
इस कार्यक्रम में केंद्रीय मंत्री और आईआईपीए-ईसी के अध्यक्ष जितेंद्र सिंह, आईआईपीए के महानिदेशक सुरेंद्रनाथ त्रिपाठी, आईआईपीए के रजिस्ट्रार अमिताभ रंजन, संकाय सदस्य और अन्य गणमान्य व्यक्ति भी शामिल हुए।
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